श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 39: अक्रूर द्वारा दर्शन  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  10.39.24 
तासां मुकुन्दो मधुमञ्जुभाषितै-
र्गृहीतचित्त: परवान् मनस्व्यपि ।
कथं पुनर्न: प्रतियास्यतेऽबला
ग्राम्या: सलज्जस्मितविभ्रमैर्भ्रमन् ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
हे गोपियो, हमारा मुकुन्द भले ही बुद्धिमान और अपने माता-पिता का बहुत आज्ञाकारी है, परन्तु एक बार मथुरा की स्त्रियों के मधुर और मीठे शब्दों के चक्कर में फँसने के बाद और उनकी आकर्षक लज्जाभरी मुस्कानों के जादू में बँध जाने पर, क्या वह फिर कभी हम गाँव की साधारण लड़कियों के पास लौटेगा?
 
हे गोपियो, हमारा मुकुन्द भले ही बुद्धिमान और अपने माता-पिता का बहुत आज्ञाकारी है, परन्तु एक बार मथुरा की स्त्रियों के मधुर और मीठे शब्दों के चक्कर में फँसने के बाद और उनकी आकर्षक लज्जाभरी मुस्कानों के जादू में बँध जाने पर, क्या वह फिर कभी हम गाँव की साधारण लड़कियों के पास लौटेगा?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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