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श्लोक 10.39.23  |
सुखं प्रभाता रजनीयमाशिष:
सत्या बभूवु: पुरयोषितां ध्रुवम् ।
या: संप्रविष्टस्य मुखं व्रजस्पते:
पास्यन्त्यपाङ्गोत्कलितस्मितासवम् ॥ २३ ॥ |
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| अनुवाद |
| इस रात के बाद का सवेरा मथुरा की स्त्रियों के लिए बेशक शुभ होगा। अब उनकी सारी आशाएँ पूरी होंगी। क्योंकि जैसे ही व्रजपति उनके शहर में कदम रखेंगे वैसे ही वे उनके मुख से निकलती मुस्कान के अमृत का पान कर लेंगी। |
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| इस रात के बाद का सवेरा मथुरा की स्त्रियों के लिए बेशक शुभ होगा। अब उनकी सारी आशाएँ पूरी होंगी। क्योंकि जैसे ही व्रजपति उनके शहर में कदम रखेंगे वैसे ही वे उनके मुख से निकलती मुस्कान के अमृत का पान कर लेंगी। |
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