श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 39: अक्रूर द्वारा दर्शन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  10.39.21 
क्रूरस्त्वमक्रूरसमाख्यया स्म न-
श्चक्षुर्हि दत्तं हरसे बताज्ञवत् ।
येनैकदेशेऽखिलसर्गसौष्ठवं
त्वदीयमद्राक्ष्म वयं मधुद्विष: ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
हे विधाता, यद्यपि आप यहाँ अक्रूर नाम लिए हैं, आप क्रूर हैं। क्योंकि आप मूर्खों के समान हमसे वही चीज छीन रहे हैं जो आपने एक समय हमें दी थी — वे आँखें जिससे हमने भगवान मधुद्विष के रूप के एक पहलू में आपकी पूरी रचना की पूर्णता देखी है।
 
हे विधाता, यद्यपि आप यहाँ अक्रूर नाम लिए हैं, आप क्रूर हैं। क्योंकि आप मूर्खों के समान हमसे वही चीज छीन रहे हैं जो आपने एक समय हमें दी थी — वे आँखें जिससे हमने भगवान मधुद्विष के रूप के एक पहलू में आपकी पूरी रचना की पूर्णता देखी है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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