श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 39: अक्रूर द्वारा दर्शन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  10.39.2 
किमलभ्यं भगवति प्रसन्ने श्रीनिकेतने ।
तथापि तत्परा राजन्न हि वाञ्छन्ति किञ्चन ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन्, जिसने लक्ष्मी नारायण भगवान को सन्तुष्ट कर लिया हो, उसके लिए इस सृष्टि में अन्य कोई लक्ष्य प्राप्त करने का प्रश्न ही नहीं है। इसके बावजूद जो लोग उनकी भक्ति में लीन हैं, वे कभी उनसे कुछ नहीं मांगते हैं।
 
हे राजन्, जिसने लक्ष्मी नारायण भगवान को सन्तुष्ट कर लिया हो, उसके लिए इस सृष्टि में अन्य कोई लक्ष्य प्राप्त करने का प्रश्न ही नहीं है। इसके बावजूद जो लोग उनकी भक्ति में लीन हैं, वे कभी उनसे कुछ नहीं मांगते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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