श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 39: अक्रूर द्वारा दर्शन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  10.39.15 
अन्याश्च तदनुध्याननिवृत्ताशेषवृत्तय: ।
नाभ्यजानन्निमं लोकमात्मलोकं गता इव ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
अन्य गोपियाँ पूर्ण रूप से अपने संवेदी कार्यों को रोककर कृष्ण के ध्यान में स्थिर हो गईं। आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने वालों की तरह, उन्हें बाहरी दुनिया का सारा भान खो गया था।
 
The thoughts of other gopis stopped completely and they became engrossed in the meditation of Krishna. Like those who have attained the state of self-realization, they forgot all the consciousness of the external world.
तात्पर्य
दरअसल, गोपियाँ आत्मज्ञान के मंच पर पहले से ही थीं। चैतन्य-चरितामृत (मध्य 20.108) में कहा गया है, जीवेर स्वरूप हया कृष्णेर नित्य-दास: "आत्मा या व्यक्तिगत आत्मा कृष्ण का शाश्वत सेवक है।" इस प्रकार, क्योंकि वे भगवान को सबसे गहन प्रेमपूर्ण सेवा प्रदान कर रही थीं, गोपियाँ आत्मसाक्षात्कार के उच्चतम स्तर पर स्थित थीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)