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श्लोक 10.39.1  |
श्रीशुक उवाच
सुखोपविष्ट: पर्यङ्के रामकृष्णोरुमानित: ।
लेभे मनोरथान्सर्वान्पथि यन् स चकार ह ॥ १ ॥ |
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| अनुवाद |
| शुकदेव गोस्वामी बोले : भगवान श्री बलराम और भगवान श्री कृष्ण द्वारा बहुत मान-सम्मान मिलने पर एक सोफे पर आराम से बैठे हुए अक्रूर को लगा कि रास्ते में उन्होंने जो इच्छाएँ सोची थीं, वे अब सब पूरी हो गई हैं। |
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| शुकदेव गोस्वामी बोले : भगवान श्री बलराम और भगवान श्री कृष्ण द्वारा बहुत मान-सम्मान मिलने पर एक सोफे पर आराम से बैठे हुए अक्रूर को लगा कि रास्ते में उन्होंने जो इच्छाएँ सोची थीं, वे अब सब पूरी हो गई हैं। |
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