श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 38: वृन्दावन में अक्रूर का आगमन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  10.38.9 
द्रक्ष्यामि नूनं सुकपोलनासिकं
स्मितावलोकारुणकञ्जलोचनम् ।
मुखं मुकुन्दस्य गुडालकावृतं
प्रदक्षिणं मे प्रचरन्ति वै मृगा: ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
अवश्य ही मैं भगवान मुकुंद के मुखारविंद की झलक पाऊँगा क्योंकि अभी-अभी मेरे दाहिनी ओर से हिरणों का झुण्ड निकला है। उनका वह मुख जिस पर सुंदर घुँघराले बाल विराजमान हैं, आकर्षक गाल तथा नासिका और मंद-मंद मुस्कान वाली सुंदर चंचल आँखें ज़रूर दर्शन देंगी।
 
I will certainly see the face of Lord Mukunda, since the deer are now passing from my right side. That face is surrounded by curly hair and is adorned with His attractive cheeks and nose, His gently smiling look and His red lotus-like eyes.
तात्पर्य
अक्रूर ने मंगलकारी शकुन देखा - अपने दायें ओर से एक जंगली जानवर को गुजरते हुए - जिससे वह आश्वस्त हो गए कि वे परम प्रभु कृष्ण को देखेंगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)