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श्रीमद् भागवतम
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स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ
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अध्याय 38: वृन्दावन में अक्रूर का आगमन
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श्लोक 43
श्लोक
10.38.43
इत्थं सूनृतया वाचा नन्देन सुसभाजित: ।
अक्रूर: परिपृष्टेन जहावध्वपरिश्रमम् ॥ ४३ ॥
अनुवाद
नन्द महाराज के पूछताछ के इन सत्य और मीठे शब्दों से सम्मानित होकर अक्रूर अपनी यात्रा की थकान भूल गए।
Being honoured by Nanda Maharaja for these truthful and sweet words of inquiry, Akrura forgot the fatigue of his journey.
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दस के अंतर्गत अड़तालीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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