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bhagavat 10.38.4: चूँकि मैं विषय-भोगों में लीन रहने वाला भौतिकतावादी व्यक्ति हूँ, इसलिए अपने लिए उत्तम श्लोक में स्तुति किए जाने वाले भगवान का दर्शन करना मेरे लिए उतना ही कठिन है जितना कि शूद्र के रूप में जन्मे व्यक्ति के लिए वैदिक मंत्रों का उच्चारण करने की अनुमति प्राप्त करना।   |   bhagavat अध्याय 10.38: वृन्दावन में अक्रूर का आगमन   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 38: वृन्दावन में अक्रूर का आगमन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  10.38.4 
ममैतद् दुर्लभं मन्य उत्तम:श्लोकदर्शनम् ।
विषयात्मनो यथा ब्रह्मकीर्तनं शूद्रजन्मन: ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
चूँकि मैं विषय-भोगों में लीन रहने वाला भौतिकतावादी व्यक्ति हूँ, इसलिए अपने लिए उत्तम श्लोक में स्तुति किए जाने वाले भगवान का दर्शन करना मेरे लिए उतना ही कठिन है जितना कि शूद्र के रूप में जन्मे व्यक्ति के लिए वैदिक मंत्रों का उच्चारण करने की अनुमति प्राप्त करना।
 
Since I am a materialistic person absorbed in sensual pleasures, I find it as difficult for me to obtain this opportunity of seeing the Lord who is praised in the best verses as it is for a person born as a sudra to obtain permission to chant the Vedic mantras.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)