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bhagavat 10.37.5: चैतन्य प्राप्त करते ही केशी गुस्से में उठ खड़ा हुआ। उसने अपना मुँह पूरी तरह से खोल लिया और वह फिर से कृष्ण पर हमला करने के लिए दौड़ा। लेकिन कृष्ण मुस्कुराए और अपनी बाईं भुजा को घोड़े के मुँह में उसी आसानी से डाल दिया जैसे कोई साँप किसी भूमि में बने छेद में घुस जाता है।   |   bhagavat अध्याय 10.37: केशी तथा व्योम असुरों का वध   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 37: केशी तथा व्योम असुरों का वध  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  10.37.5 
स: लब्धसंज्ञ: पुनरुत्थितो रुषा
व्यादाय केशी तरसापतद्धरिम् ।
सोऽप्यस्य वक्त्रे भुजमुत्तरं स्मयन्
प्रवेशयामास यथोरगं बिले ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
चैतन्य प्राप्त करते ही केशी गुस्से में उठ खड़ा हुआ। उसने अपना मुँह पूरी तरह से खोल लिया और वह फिर से कृष्ण पर हमला करने के लिए दौड़ा। लेकिन कृष्ण मुस्कुराए और अपनी बाईं भुजा को घोड़े के मुँह में उसी आसानी से डाल दिया जैसे कोई साँप किसी भूमि में बने छेद में घुस जाता है।
 
When Kesi regained consciousness, he got up in anger. He opened his mouth wide and rushed to attack Krishna again. But Krishna laughed and put his left arm into the horse's mouth as easily as a snake enters a hole in the ground.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)