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bhagavat 10.37.4: किन्तु असाधारण भगवान् ने केशी के प्रहार से अपने को बचाया और फिर क्रोधित होकर अपने हाथों से राक्षस के पैरों को पकड़कर उसे आकाश में घुमाते हुए सौ धनुषों की दूरी तक तिरस्कारपूर्वक उसी प्रकार फेंक दिया, जिस प्रकार गरुड़ एक सांप को फेंक देता है। उसके बाद भगवान् कृष्ण वहीं खड़े हो गये।   |   bhagavat अध्याय 10.37: केशी तथा व्योम असुरों का वध   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 37: केशी तथा व्योम असुरों का वध  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  10.37.4 
तद् वञ्चयित्वा तमधोक्षजो रुषा
प्रगृह्य दोर्भ्यां परिविध्य पादयो: ।
सावज्ञमुत्सृज्य धनु:शतान्तरे
यथोरगं तार्क्ष्यसुतो व्यवस्थित: ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
किन्तु असाधारण भगवान् ने केशी के प्रहार से अपने को बचाया और फिर क्रोधित होकर अपने हाथों से राक्षस के पैरों को पकड़कर उसे आकाश में घुमाते हुए सौ धनुषों की दूरी तक तिरस्कारपूर्वक उसी प्रकार फेंक दिया, जिस प्रकार गरुड़ एक सांप को फेंक देता है। उसके बाद भगवान् कृष्ण वहीं खड़े हो गये।
 
But the divine Lord saved Himself from Kesi's attack and then, in a fit of rage, He caught hold of the demon's feet with His arms and whirled him round and round in the sky and threw him contemptuously a distance of one hundred dhanushas, ​​just as Garuda throws a serpent. Then Lord Krishna stood there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)