श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 36: वृषभासुर अरिष्ट का वध  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  10.36.3-4 
यस्य निर्ह्रादितेनाङ्ग निष्ठुरेण गवां नृणाम् ।
पतन्त्यकालतो गर्भा: स्रवन्ति स्म भयेन वै ॥ ३ ॥
निर्विशन्ति घना यस्य ककुद्यचलशङ्कया ।
तं तीक्ष्णश‍ृङ्गमुद्वीक्ष्य गोप्यो गोपाश्च तत्रसु: ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन, तीक्ष्ण सींगों वाले अरिष्टासुर के कूबड़ को पहाड़ समझकर बादल उसके आसपास मँडराते थे। जब ग्वाल-बाल और गोपियों ने उस राक्षस को देखा, तो वे डर से काँपने लगे। दरअसल, उसकी दहाड़ की तीव्र गूँज इतनी भयावह थी कि गर्भवती गायों और महिलाओं का गर्भ गिर गया।
 
O King, mistaking the sharp-horned body of Arishtasura for a mountain, the clouds began to hover around him, so when the cowherds and milkmaids saw the demon, they became frightened. In fact, the loud echo of his roar was so terrifying that pregnant cows and women suffered abortions.
तात्पर्य
वैदिक साहित्य गर्भपात को निम्न प्रकार से वर्गीकृत करता है: आ-चतुर्थाद् भवेत् स्राव: पात: पंचम-षष्ठयो:। अत ऊर्ध्वं प्रसूति: स्यात्। “चौथे महीने तक एक समय से पहले प्रसव को स्राव कहा जाता है, पांचवें और छठे महीने में इसे पाता कहा जाता है, और इसके बाद इसे जन्म (प्रसूति) माना जाता है।”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)