श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 36: वृषभासुर अरिष्ट का वध  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  10.36.16 
अरिष्टे निहते दैत्ये कृष्णेनाद्भ‍ुतकर्मणा ।
कंसायाथाह भगवान् नारदो देवदर्शन: ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
अद्भुत कार्य करने वाले श्रीकृष्ण द्वारा अरिष्टासुर के वध हो जाने के पश्चात, नारद मुनि राजा कंस से यह बताने गये। दैवीय दृष्टि वाले इस शक्तिशाली मुनि ने राजा से इस प्रकार कहा।
 
When Arishtasura was killed by the wonderful Krishna, Sage Narad went to inform King Kansa. This powerful sage with divine sight told the king as follows.
तात्पर्य
शब्द "देव-दर्शन" का अर्थ कई रूपों में समझा जा सकता है, जो सभी इस कहानी के संदर्भ और उद्देश्य के अनुरूप हैं। देव का अर्थ है "भगवान", और दर्शनः का अर्थ है "देखना" या "किसी महान व्यक्तित्व से मिलना"। इस प्रकार नारद मुनि के नाम देव-दर्शन से पता चलता है कि नारद ने भगवान को देखने की पूर्णता प्राप्त कर ली है, नारद के दर्शन प्राप्त करना भगवान के दर्शन प्राप्त करने के समान है (क्योंकि नारद भगवान के शुद्ध प्रतिनिधि हैं), और यह भी कि नारद का दर्शन देवताओं जैसा ही है, जिन्हें देव के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि देव-दर्शन शब्द के इतने सारे अर्थ श्रीमद्-भागवतम की भाषा की समृद्धि का कुछ पता देते हैं।

पुराणों से, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने राधा और कृष्ण के बीच की एक मजाकिया बातचीत का वर्णन करते हुए बीस श्लोक उद्धृत किए हैं जो कृष्ण द्वारा दानव अरिष्ट का वध करने के बाद हुई थी। आचार्य द्वारा इतनी दयालुता से उद्धृत इस बातचीत में राधा-कुंड और श्याम-कुंड, राधा और कृष्ण के स्नान तालाबों की उत्पत्ति का वर्णन है। श्लोक इस प्रकार हैं:

मास्मान स्पृशाद्य वृषभार्दन हंता मुग्धा

घोरोऽसुरोऽयं अयि कृष्ण तदप्ययं गौः

वृत्रो यथा द्विज इहास्त्य अयि निष्कृतिः किं

शुद्ध्येद्भवान् त्रि-भुवन-स्थित-तीर्थ-कृच्छ्रात्

"निर्दोष युवा गोपियों ने कहा, 'अरे कृष्ण, अब हमें मत छुओ, हे बैल-हत्यारे! अफसोस, भले ही अरिष्ट एक भयानक दानव था, लेकिन फिर भी वह एक नर बैल था, इसलिए आपको प्रायश्चित्त करना होगा, जिस तरह भगवान इंद्र ने वृत्रासुर को मारने के बाद किया था। लेकिन आप तीनों लोकों में हर एक पवित्र स्थान पर जाने की परेशानी के बिना खुद को कैसे शुद्ध कर सकते हैं?''

किं पर्यटामि भुवनान्य अदुनेव सर्व

आनीय तीर्थ-विततीः करवाणि तासु

स्नानं विलोकयत तावदिदं मुकुन्दः

प्रोच्यैव तत्र कृतवान् बटा पार्ष्णि-घातम्

"[कृष्ण ने उत्तर दिया,] 'मुझे पूरे ब्रह्मांड में क्यों भटकना पड़ेगा? मैं तुरंत सभी अनगिनत तीर्थ स्थानों को यहां लाऊंगा और उनमें स्नान करूंगा। बस देखो!' इसके साथ, भगवान मुकुंद ने जमीन पर अपनी एड़ी से प्रहार किया।"

पातालतो जलमिदं किल भोगवत्या

आयातमत्र निकिला अपि तीर्थ-संघाः

आगच्छतेति भगवद-वचसा त एत्य

तत्रैव रेजुरथ कृष्ण उवाच गोपीः

"[फिर उन्होंने कहा,] 'यह पाताल क्षेत्र से आने वाली भोगवती नदी का पानी है। और अब, हे पवित्र स्थानों, आप सभी कृपया यहाँ आएँ!' जब सर्वोच्च भगवान ने ये शब्द कहे, तो सभी पवित्र स्थान वहाँ गए और उनके सामने प्रकट हुए। कृष्ण ने फिर गोपियों को इस प्रकार संबोधित किया।"

तीर्थानि पश्यत हरेश वचसा तवैवं

नैव प्रतिमा इति ता अथ तीर्थ-वर्याः

प्रोचुः कृताञ्जलि-पुटा लवणाब्धिरस्मि

क्षीराबधिरस्मि श्रृणुतामर-दीर्घिकास्मि

"'पवित्र स्थलों को देखो!'

"लेकिन गोपियों ने उत्तर दिया, 'हम उन्हें उस तरह नहीं देखते जैसे आप बताते हैं।'

"तब उन पवित्र स्थानों में से सर्वश्रेष्ठ ने विनती करते हुए अपने हाथ जोड़कर कहा:

"'मैं लवण समुद्र हूँ।'

"'मैं क्षीर सागर हूँ।'

"'मैं अमर-दीर्घिका हूँ।'"

शोणोऽपि सिंधुरहमस्मि भवामि ताम्र-

पर्णी च पुष्करमहं च सरस्वती च

गोदावरी रवि-सुता सरयुः प्रयागो

रेवास्मि पश्यत जलं कुरुता प्रतीतिम्

"'मैं शोण नदी हूँ।'

"'मैं सिंधु हूँ।'

"'मैं ताम्रपर्णी हूँ।'

"'मैं पवित्र स्थान पुष्कर हूँ।'

"'मैं सरस्वती नदी हूँ।'

"'और हम गोदावरी, यमुना और रेवा नदियाँ और प्रयाग में नदियों का संगम हैं। बस हमारे जल को देखो!'"

स्नात्वा ततो हरिरति-प्रजगल्भ एव

शुद्धः सरोऽप्यकरवं स्थिता-सर्व-तीर्थम्

युष्माभिर आत्म-जनुषीह कृतो न धर्मः

कोऽपि क्षितौ अथा सखीर निजगाद राधा

"स्नान करके स्वयं को शुद्ध करने के बाद, भगवान हरि काफी अभिमानी हो गए और बोले, 'मैंने सभी विभिन्न पवित्र स्थानों वाला एक तालाब तैयार किया है, जबकि तुम गोपियों ने शायद भगवान ब्रह्मा की खुशी के लिए इस धरती पर कभी कोई धार्मिक कर्तव्य नहीं निभाया होगा।' तब श्रीमती राधारानी ने अपनी सहेलियों को इस प्रकार संबोधित किया।"

कार्यं मयाप्यति-मनोहर-कुण्डम एकं

तस्माद्यतध्वम इति तद्-वचनैना ताभिः

श्री-कृष्ण-कुण्ड-तट-पश्चिम-दिश्य-मण्डो

गर्तः कृतो वृषभ-दैत्य-खुरैर्व्यलोक्य

"'मुझे और भी अधिक सुंदर तालाब बनाना होगा। तो काम पर जाओ!' ये शब्द सुनकर गोपियों ने देखा कि अरिष्टासुर के खुरों ने श्री कृष्ण के तालाब के पश्चिम में एक उथली खाई खोद दी है।"

tatrārdra-mṛn-mṛdula-gola-tatīḥ prati-sva-

hastoddhṛtā anati-dūra-gatā vidhāya

divyaṁ saraḥ prakaṭitaṁ ghaṭikā-dvayena

tābhir vilokya sarasaṁ smarate sma kṛṣṇaḥ

“आस-पास एक जगह सभी गोपियों ने अपने हाथों से नरम मिट्टी की ढेरियों से खुदाई शुरू की, और इस तरह कुछ घंटों में एक दिव्य तालाब अस्तित्व में आ गया। कृष्ण उस तालाब को देख कर हैरान रह गए जो उन्होंने बनाया था।"

proce ca tīrtha-salilaiḥ paripūrayaitan

mat-kuṇḍataḥ sarasijākṣi sahālibhis tvam

rādhā tadā na na na neti jagāda yasmāt

tvat-kuṇḍa-nīram uru-go-vadha-pātakāktam

“उन्होंने कहा, 'ठीक है, कमल नयनी। तुम्हें और तुम्हारे साथियों को इस तालाब को मेरे तालाब के पानी से भर देना चाहिए।'

"लेकिन राधा ने जवाब दिया, 'नहीं, नहीं, नहीं, नहीं! यह असंभव है, क्योंकि तुम्हारे तालाब का पानी एक गाय को मारने के तुम्हारे भयानक पाप से दूषित है।'"

āhṛtya puṇya-salilaṁ śata-koṭi-kumbhaiḥ

sakhy-arbudena saha mānasa-jāhnavītaḥ

etat saraḥ sva-madhunā paripūrayāmi

tenaiva kīrtim atulāṁ tanavāni loke

“'मैं अपनी असंख्य गोपी साथियों से मानस-गंगा का शुद्ध पानी अरबों बर्तनों में यहाँ लाऊंगी। इस तरह मैं इस झील को अपने पानी से भर दूँगी और इस तरह दुनिया में इसकी तुलनाहीन ख्याति बनाऊँगी।'"

kṛṣṇeṅgitena sahasaitya samasta-tīrtha-

sakhyas tadīya-saraso dhṛta-divya-mūrtiḥ

tuṣṭāva tatra vṛṣabhānu-sutāṁ praṇamya

bhaktyā kṛtāñjali-puṭaḥ sravad-asra-dhāraḥ

“भगवान कृष्ण ने तब एक स्वर्गीय व्यक्तित्व को इशारा किया जो सभी पवित्र स्थानों का घनिष्ठ सहयोगी था। अचानक वह व्यक्ति कृष्ण के तालाब से उठ खड़ा हुआ और श्री वृषभानु की बेटी [राधारानी] को प्रणाम किया। फिर, हाथ जोड़े और आँखों से आँसू बहाते हुए, वह उनकी भक्ति में प्रार्थना करने लगा।"

devi tvadīya-mahimānam avaiti sarva

śāstrārtha-vin na ca vidhir na haro na lakṣmīḥ

kintv eka eva puruṣārtha-śiromaṇis tvat-

prasveda-mārjana-paraḥ svayam eva kṛṣṇaḥ

“'हे देवी, सभी शास्त्रों के ज्ञाता स्वयं भगवान ब्रह्मा भी आपके गौरव को नहीं समझ सकते, न ही भगवान शिव या लक्ष्मी। केवल कृष्ण, जो सभी मानवीय प्रयासों का सर्वोच्च लक्ष्य है, उन्हें समझ सकते हैं, और इस तरह वह खुद यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य महसूस करते हैं कि जब आप थके हुए हों तो आप अपना पसीना पोछ सकें।'"

yaś cāru-yāvaka-rasena bhavat-padābjam

ārajya nūpuram aho nidadhāti nityam

prāpya tvadīya-nayanābja-taṭa-prasādaṁ

svaṁ manyate parama-dhanyatamaṁ prahṛṣyan

tasyājñayaiva sahasā vayam ājagāma

tat-pārṣṇi-ghāṭa-kṛta-kuṇḍa-vare vasāmaḥ

tvaṁ cet prasīdasi karoṣi kṛpā-kaṭākṣaṁ

tarhy eva tarṣa-viṭapī phalito bhaven naḥ

“'वह हमेशा आपके चरण-कमलों को चरू और यावक अमृत से अभिषेक करता है और उन्हें टखने की घंटियों से सजाता है, और वह केवल आपके चरण-कमलों की उंगलियों की युक्तियों को संतुष्ट करके खुशी मनाता है और सबसे भाग्यशाली महसूस करता है। उनके आदेश पर हम तुरंत यहाँ रहने के लिए आए हैं, इस सबसे उत्कृष्ट तालाब में, जिसे उन्होंने अपनी एड़ी के एक झटके से बनाया है। परन्तु केवल तभी जब आप अब हमसे संतुष्ट होंगी और हम पर अपनी दयालु दृष्टि डालेंगी, हमारी इच्छा का वृक्ष फल देगा।'"

śrutvā stutiṁ nikhila-tīrtha-gaṇasya tuṣṭā

prāha sma tarṣam ayi vedayateti rādhā

yāma tvadīya-sarasīṁ sa-phalā bhavāma

ity eva no vara iti prakaṭaṁ tadocuḥ

“पवित्र स्थानों की पूरी सभा के प्रतिनिधि द्वारा बोली गई इस प्रार्थना को सुनकर, श्री राधा प्रसन्न हुईं और कहां, 'तो, कृपया मुझे अपनी इच्छा बताएँ।'

"फिर उन्होंने उसे स्पष्ट रूप से बताया, 'यदि हम आपके तालाब में आ सकें तो हमारा जीवन सफल हो जाएगा। वह वरदान हम चाहते हैं।'"

āgacchateti vṛṣabhānu-sutā smitāsyā

provāca kānta-vadanābja-dhṛtākṣi-koṇā

sakhyo ’pi tatra kṛta-sammatayaḥ sukhābdhau

magnā virejur akhilā sthira-jaṅgamāś ca

“अपनी प्यारी से अपनी आँखों के कोनों से देखते हुए, वृषभानु की बेटी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, 'कृपया आओ।' उनकी गोपी साथी सभी उसके फैसले से सहमत हो गए और खुशी के सागर में डूब गए। वास्तव में, स्थिर और गतिमान दोनों ही प्राणियों की सुंदरता बढ़ गई थी।"

prāpya prasādam atha te vṛṣabhānujāyāḥ

śrī-kṛṣṇa-kuṇḍa-gata-tīrtha-varāḥ prasahya

bhittveva bhittim ati-vegata eva rādhā-

kuṇḍaṁ vyadhuḥ sva-salilaiḥ paripūrṇam eva

“इस तरह श्रीमती राधारानी की कृपा से श्री कृष्ण-कुण्ड में पवित्र नदियां और झीलें अपनी सीमा की दीवारों को तोड़ कर तेजी से राधा-कुण्ड को अपने पानी से भरती हैं।”

"प्रोचे हरिः प्रियतमे तव कुण्डम् एतत्

मत-कुण्डतोऽपि महिमाधिकम् अस्तु लोके

अत्रैव मे सलिल-केलिर इहैव नित्यं

स्नानं यथा त्वम् असि तद्वद् इदं सरों मे"

"भगवान हरि ने तब कहा, 'मेरी प्रिय राधा, आपका यह तालाब मेरे से भी अधिक विश्व-प्रसिद्ध हो। मैं हमेशा यहाँ स्नान करने और अपने जल-विहार का आनंद लेने आऊँगा। वास्तव में, यह झील मुझे उतनी ही प्रिय है जितनी कि आप।'"

"राधाब्रवीद अहम् अपि स्व-सखीभिर एत्य

स्नास्यामि अरिष्ट-शत-मर्दनम् अस्तु तस्य

योऽरिष्ट-मर्दन-सरस्य उरु-भक्तिर अत्र

स्नायाद् वसेन मम स एव महा-प्रियोऽस्तु"

"राधा ने उत्तर दिया, 'मैं आपके तालाब में भी स्नान करने आऊँगी, भले ही आप यहाँ सैकड़ों अरिष्ट राक्षसों को मार डालें। भविष्य में, जो कोई भी इस झील के लिए गहन भक्ति रखता है, जो उस स्थान पर है जहाँ आपने अरिष्टासुर को दंडित किया था, और जो यहाँ स्नान करता है या रहता है, वह निश्चित रूप से मुझे बहुत प्रिय हो जाएगा।'"

"रासोत्सवम् प्रकुरुते स्म च तत्र रात्रौ

कृष्णांबुदः कृत-महा-रस-हर्ष-वर्षः

श्री-राधिक-प्रवर-विद्युद अलंकृत-श्रीस्

त्रैलोक्य-मध्य-वितती-कृता-दिव्य-कीर्तिः"

"उस रात राधा-कुंड में भगवान कृष्ण ने एक रास नृत्य की शुरुआत की, जिससे सबसे अधिक शानदार आनंद का मूड उत्पन्न हुआ। श्री कृष्ण एक बादल से मिलते-जुलते थे, और श्रीमती राधारानी बिजली की एक चमकदार चमक थी जो आकाश को प्रचुर मात्रा में सुंदरता से भर देती थी। इस तरह उनकी दिव्य महिमा ने तीनों लोकों के विस्तार में व्याप्त किया।"

अंत में, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि नारद मुनि, एक महान ऋषि होने के कारण, समझ गए थे कि अरिष्ट के वध से वृंदावन में कृष्ण के लीलाओं का कमोबेश समापन हो गया है। इसलिए कृष्ण के लीलाओं को मथुरा में स्थानांतरित करने की सुविधा के लिए उत्सुक नारद, कंस के पास पहुंचे और उन्हें इस प्रकार संबोधित किया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)