श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 35: कृष्ण के वनविहार के समय गोपियों द्वारा कृष्ण का गायन  »  श्लोक 8-11
 
 
श्लोक  10.35.8-11 
अनुचरै: समनुवर्णितवीर्य
आदिपूरुष इवाचलभूति: ।
वनचरो गिरितटेषु चरन्ती-
र्वेणुनाह्वयति गा: स यदा हि ॥ ८ ॥
वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं
व्यञ्जयन्त्य इव पुष्पफलाढ्या: ।
प्रणतभारविटपा मधुधारा:
प्रेमहृष्टतनवो ववृषु: स्म ॥ ९ ॥
दर्शनीयतिलको वनमाला-
दिव्यगन्धतुलसीमधुमत्तै: ।
अलिकुलैरलघुगीतामभीष्ट-
माद्रियन् यर्हि सन्धितवेणु: ॥ १० ॥
सरसि सारसहंसविहङ्गा-
श्चारुगीताहृतचेतस एत्य ।
हरिमुपासत ते यतचित्ता
हन्त मीलितद‍ृशो धृतमौना: ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
कृष्ण अपने साथियों के संग जब जंगल में घूमते हैं, तो उनके साथी उनके गौरवशाली कारनामों का ज़ोर-शोर से बखान करते हैं। इस दौरान कृष्ण ठीक वैसे ही लगते हैं जैसे वो सर्वशक्तिमान हैं और वे वो सब कुछ कर दिखा सकते हैं जो कोई नहीं कर सकता। जब गायें पहाड़ों पर विचरण करती हैं और कृष्ण अपनी बांसुरी बजाकर उन्हें बुलाते हैं, तो जंगल के पेड़ और लताएँ फल और फूलों से लद जाते हैं, जैसे कि वे अपने हृदय के भीतर भगवान विष्णु को प्रकट कर रहे हों। जब उनकी शाखाएँ भार से झुक जाती हैं, तो उनकी चड्डियों और बेलों पर तंतु रोमांचित होकर खड़े हो जाते हैं और पेड़ और लताएँ दोनों ही मधुर रस की वर्षा करने लगते हैं।
कृष्ण की माला में लगे तुलसी के फूलों की दिव्य सुगंध से मधुमक्खियाँ पागल हो जाती हैं और उसके लिए बड़े उत्साह से भनभनाने लगती हैं। ऐसे में कृष्ण, जो पुरूषों में सबसे सुंदर हैं, अपने होठों पर बांसुरी रखकर और उसे बजाकर उनके गीत की सराहना करते हैं। बांसुरी की मनमोहक धुन सारस, हंस और झील में रहने वाले अन्य पक्षियों का मन मोह लेती है और वे सब अपनी आँखें बंद करके और मौन रहकर गहरे ध्यान में डूबकर भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं।
 
Kṛṣṇa roams the forest with His friends. These friends loudly sing His glorious deeds. Thus He appears to display His inexhaustible opulence, like the Supreme Personality of Godhead. When the cows wander along the mountain foothills and Kṛṣṇa calls them with the tune of His flute, the trees and creepers of the forest, in response, become so laden with flowers and fruits that they seem to manifest Lord Viṣṇu within their hearts. When their branches bend down with the weight, the fibres of their trunks and creepers rise up like hairs in love for the Lord, and both trees and creepers pour out sweet nectar. Flocks of bumble bees, maddened by the divine honey-like odour of the tulasi flowers in the garland worn by Kṛṣṇa, hum loudly to Him, and Kṛṣṇa, the most beautiful of men, places His flute on His lips and plays it, praising their song with thanks. Then the enchanting flute song steals the minds of the cranes, swans and other birds living in the lake. Of course all of them approach Him with their eyes closed and silent and worship Him by fixing their consciousness on Him in deep meditation.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इन छंदों पर कई प्रकार की टिप्पणियाँ प्रस्तुत की हैं। उन्होंने इस तरह का उपमा देते हैं कि जब गृहस्थ वैष्णव एक कीर्तन मंडली के निकट आने की बात सुनते हैं तो वे प्रसन्न होकर नमस्कार करते हैं, ठीक इसी तरह जब वृंदावन के पेड़ और लता में कृष्ण की बाँसुरी की धुन सुनी तो वे प्रसन्न हो उठे और अपनी शाखाओं के साथ नीचे की तरफ झुक गए। छंद 10 में दिए गए दर्शनीय-तिलक शब्द का अर्थ न केवल यह है कि प्रभु "देखने में सर्वश्रेष्ठ हैं" बल्कि इस बात का भी संकेत देता है कि उन्होंने स्वयं को वृंदावन वन की खनिज संपन्न मिट्टी से प्राप्त किए गए आकर्षक लाल तिलक से सुशोभित किया है।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती इस ओर भी संकेत करते हैं कि तुलसी, हालाँकि कई मायनों में उत्कृष्ट है, लेकिन सामान्य रूप से उसे विशेष रूप से सुगंधित पौधा नहीं माना जाता है। हालाँकि, सुबह के समय तुलसी से एक दिव्य सुगंध निकलती है जिसे साधारण लोग समझ नहीं सकते हैं लेकिन दैवीय लोग उसकी पूरी तरह से सराहना करते हैं। भगवान के गले में पड़ी मालाओं के फूलों पर मंडराने वाले मधुमक्खियाँ निश्चित रूप से इस सुगंध की सराहना करते हैं, और श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने भगवतम (3.15.19) से इसके प्रभाव के बारे में उद्धृत करते हुए कहा कि वैकुण्ठ के सबसे सुगंधित पौधे भी तुलसी-देवी की विशेष योग्यताओं की सराहना करते हैं।

छंद 10 में दिए गए शब्द संधित-वेणुः का अर्थ है कि भगवान कृष्ण ने अपनी बांसुरी को अपने होठों पर दृढ़ता से रखा था और उस बांसुरी से निकलने वाली धुन निश्चित रूप से सबसे मोहक धुन है, जैसा कि इस अध्याय में गोपियाँ वर्णन करती हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)