श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती इस ओर भी संकेत करते हैं कि तुलसी, हालाँकि कई मायनों में उत्कृष्ट है, लेकिन सामान्य रूप से उसे विशेष रूप से सुगंधित पौधा नहीं माना जाता है। हालाँकि, सुबह के समय तुलसी से एक दिव्य सुगंध निकलती है जिसे साधारण लोग समझ नहीं सकते हैं लेकिन दैवीय लोग उसकी पूरी तरह से सराहना करते हैं। भगवान के गले में पड़ी मालाओं के फूलों पर मंडराने वाले मधुमक्खियाँ निश्चित रूप से इस सुगंध की सराहना करते हैं, और श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने भगवतम (3.15.19) से इसके प्रभाव के बारे में उद्धृत करते हुए कहा कि वैकुण्ठ के सबसे सुगंधित पौधे भी तुलसी-देवी की विशेष योग्यताओं की सराहना करते हैं।
छंद 10 में दिए गए शब्द संधित-वेणुः का अर्थ है कि भगवान कृष्ण ने अपनी बांसुरी को अपने होठों पर दृढ़ता से रखा था और उस बांसुरी से निकलने वाली धुन निश्चित रूप से सबसे मोहक धुन है, जैसा कि इस अध्याय में गोपियाँ वर्णन करती हैं।
