बर्हिणस्तबकधातुपलाशै-
र्बद्धमल्लपरिबर्हविडम्ब: ।
कर्हिचित् सबल आलि स गोपै-
र्गा: समाह्वयति यत्र मुकुन्द: ॥ ६ ॥
तर्हि भग्नगतय: सरितो वै
तत्पदाम्बुजरजोऽनिलनीतम् ।
स्पृहयतीर्वयमिवाबहुपुण्या:
प्रेमवेपितभुजा: स्तिमिताप: ॥ ७ ॥
अनुवाद
हे प्रिय गोपी, कभी-कभी कृष्ण पत्तों, मोरपंखों और रंगीन खनिजों से सजकर पहलवान का रूप धारण करते हैं। उसके बाद, वे बलराम और ग्वालबालों के साथ बैठकर गायों को बुलाने के लिए अपनी बाँसुरी बजाते हैं। उस समय नदियाँ बहना बंद कर देती हैं, उनका पानी उस आनंद से स्तब्ध हो उठता है, जिसे वे उस हवा की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करते हुए अनुभव करती हैं जो उनके लिए भगवान के चरणकमलों की धूल लाएगी। लेकिन हमारी तरह नदियाँ भी अधिक पवित्र नहीं हैं, इसलिए वो प्रेम से काँपते हुए बाँहों से उनकी प्रतीक्षा करती रहती हैं।
O dear gopi, sometimes Krsna dresses up as a wrestler, adorning Himself with leaves, peacock feathers and colored minerals. Then He sits down with Balarama and the cowherd boys and plays His flute to call the cows. At that time the rivers stop flowing, their waters becoming still with the joy they feel while anxiously waiting for the wind that will bring them the dust from the Lord's feet. But the rivers are not as pure as we are, so they wait for Him with trembling arms in love.
तात्पर्य
गोपियां यहां कहती हैं कि श्री कृष्ण की बांसुरी की ध्वनि नदियों जैसी निर्जीव वस्तुओं को भी चेतन बना देती है और फिर वे वशीभूत होकर आनंदमग्न हो जाती हैं। जिस तरह गोपियां हमेशा कृष्ण से मिलकर नहीं रह सकती थीं, उसी तरह नदियां भी भगवान के चरणकमलों तक नहीं आ सकती थीं। यद्यपि उनकी भगवान से मिलने की इच्छा थी, पर आनंद के कारण वे हिल नहीं पाती थीं और प्रभु के प्रति प्रेम से उनकी तरंगें अर्थात् उनकी `बांहें´ कांपती थीं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)