श्रीशुक उवाच
एवं व्रजस्त्रियो राजन् कृष्णलीलानुगायती: ।
रेमिरेऽह:सु तच्चित्तास्तन्मनस्का महोदया: ॥ २६ ॥
अनुवाद
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा, हे राजन! इस प्रकार वृन्दावन की स्त्रियाँ दिन के समय कृष्ण की लीलाओं का निरन्तर गान कर प्रसन्नता का अनुभव करती थीं और उनकी बुद्धि व ह्रदय कृष्ण में लीन रहकर अत्यधिक उत्साह व आनन्द से भरे रहते थे।
Sri Sukadeva Goswami said: O King, in this way the women of Vrindavana enjoy themselves during the day by continuously singing songs of the lila (pastimes) of Krishna, and their minds and hearts remain absorbed in them and filled with boundless festive spirit.
तात्पर्य
निश्चित रूप से यह श्लोक यह पुष्टि करता है कि भग्नहृदय गोपियों का कथित दर्द वास्तव में आध्यात्मिक आनंद है। भौतिक पटल पर, दर्द ही दर्द है - बस। लेकिन आध्यात्मिक पटल पर, कथित दर्द आध्यात्मिक उल्लास का एक भिन्न प्रकार है। पश्चिमी देशों में, लोग आइसक्रीम के विभिन्न स्वादों को मिलाकर स्वाद के अद्भुत संयोजन बनाने में आनंद लेते हैं। इसी तरह, आध्यात्मिक मंच पर श्री कृष्ण और उनके भक्त आध्यात्मिक आनंद के स्वादों को कुशलता से मिलाते हैं, और इस तरह हर दिन गोपियों के लिए एक उपचार था।
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दस के अंतर्गत पैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥