निजपदाब्जदलैर्ध्वजवज्र-
नीरजाङ्कुशविचित्रललामै: ।
व्रजभुव: शमयन् खुरतोदं
वर्ष्मधुर्यगतिरीडितवेणु: ॥ १६ ॥
व्रजति तेन वयं सविलास-
वीक्षणार्पितमनोभववेगा: ।
कुजगतिं गमिता न विदाम:
कश्मलेन कवरं वसनं वा ॥ १७ ॥
अनुवाद
जब कृष्ण कमल पंखुड़ी सदृश अपने चरणों से व्रज में भ्रमण करते हैं और भूमि पर पताका, वज्र, कमल तथा अंकुश जैसे स्पष्ट चिह्न बनते हैं, तो वे पृथ्वी को गायों के खुरों के कारण हुए कष्ट को कम करते हैं। जब वे अपनी विख्यात बाँसुरी बजाते हैं, तो हाथी की अदा पर झूमते हैं। इस तरह हम गोपियाँ, जो कृष्ण की विनोदप्रिय दृष्टि के कारण कामदेव से चंचल हो उठती हैं, वृक्ष की तरह स्थिर खड़ी रह जाती हैं और अपने ढीले हुए बालों तथा वस्त्रों की सुध भी नहीं रहती।
As Krishna moves about in Vraja with His lotus-like feet, the ground is marked with symbols like flags, thunderbolts, lotus and goads and He soothes the earth from the pain of the cows' hooves. When He plays His famous flute, His body sways like an elephant. Thus we gopis, who are agitated by Kamadeva because of Krishna's playful glances, stand still like trees and do not even notice the curls in our hair and the sagging of our clothes.
तात्पर्य
यहाँ माँ यशोदा अब गोपियों की संगत में नहीं हैं, जो श्री कृष्ण के प्रति अपने वैवाहिक आकर्षण का गोपनीयता के साथ वर्णन कर रही हैं। जीव गोस्वामी और अन्य आचार्यों की टिप्पणियों से यह स्पष्ट है कि इस अध्याय में दिये गये कथन विभिन्न स्थानों और काल में कहे गये थे। यह स्वाभाविक है, क्योंकि गोपियाँ रात-दिन श्री कृष्ण के विचारों में सदा लीन रहीं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)