श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 34: नन्द महाराज की रक्षा तथा शंखचूड़ का वध  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  10.34.18 
इत्यनुज्ञाप्य दाशार्हं परिक्रम्याभिवन्द्य च ।
सुदर्शनो दिवं यात: कृच्छ्रान्नन्दश्च मोचित: ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
इस तरह से भगवान कृष्ण की अनुमति पाकर सुदर्शन चक्र ने उनकी परिक्रमा की, सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और तब अपने घर स्वर्ग लौट गया। इस तरह से नन्द महाराज खतरे से बच गए।
 
Thus, after getting permission from Lord Krishna, Sudarshan circumambulated Him, bowed down and saluted Him and then returned to his own heavenly abode. In this way, Maharaja Nanda was saved from the crisis.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)