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bhagavat 10.34.14: वास्तव में उन दयालु ऋषियों ने मेरे लाभ के लिए ही मुझे शाप दिया, क्योंकि अब मुझे समस्त लोकों के परम दिव्य गुरु के चरणों का स्पर्श प्राप्त हुआ है और इस प्रकार मेरे सारे अशुभ दूर हो गए हैं।   |   bhagavat अध्याय 10.34: नन्द महाराज की रक्षा तथा शंखचूड़ का वध   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 34: नन्द महाराज की रक्षा तथा शंखचूड़ का वध  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  10.34.14 
शापो मेऽनुग्रहायैव कृतस्तै: करुणात्मभि: ।
यदहं लोकगुरुणा पदा स्पृष्टो हताशुभ: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
वास्तव में उन दयालु ऋषियों ने मेरे लाभ के लिए ही मुझे शाप दिया, क्योंकि अब मुझे समस्त लोकों के परम दिव्य गुरु के चरणों का स्पर्श प्राप्त हुआ है और इस प्रकार मेरे सारे अशुभ दूर हो गए हैं।
 
It was indeed for my benefit that those kind Rishis cursed me, for now I had been touched by the feet of the most transcendental Master of all the worlds and thus freed from all inauspiciousness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)