श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 33: रास नृत्य  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  10.33.8 
उच्चैर्जगुर्नृत्यमाना रक्तकण्ठ्यो रतिप्रिया: ।
कृष्णाभिमर्शमुदिता यद्गीतेनेदमावृतम् ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
अनेक सुंदर रंगों से सजे कंठ वाली और प्रेम के रस का आनंद लेने के लिए आतुर गोपियों ने जोर-जोर से गीत गाए और नृत्य किया। वे कृष्ण के स्पर्श द्वारा अत्यधिक आनंदित थीं और उन्होंने जो गीत गाए उनसे पूरा ब्रह्मांड भर गया।
 
The gopis, with their throats painted in various colours, eager to enjoy the sweetness of love, sang and danced loudly. They were overjoyed to receive Krishna's touch and the songs they sang filled the entire universe.
तात्पर्य
संगीत-सार नामक संगीत के एक प्रामाणिक ग्रंथ के अनुसार, तावन्त एव रागाः सूर्यावत्यो जीव-जातिः, तेषु षोडश-सहस्री पुरा गोपी-कृता वरा: “जीवन की प्रजातियों जितने ही संगीत के राग हैं। इन रागों में से सोलह हज़ार प्रमुख हैं, जिनका प्रकटीकरण गोपियों द्वारा किया गया है।” इस प्रकार गोपियों ने सोलह हज़ार विभिन्न रागों या संगीत की मर्यादाओं का निर्माण किया है, जो आज सारे संसार में फैल गए हैं। यद-गीतेनेदम आवृतम् शब्दों से यह भी संकेत मिलता है कि आज भी सारे संसार के भक्त गोपियों के उदाहरण का अनुसरण करते हुए कृष्ण की प्रशंसा करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)