श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती बताते हैं कि गोपियाँ मुद्राओं (उंगलियों से बनने वाले सटीक हाव-भाव जो भावनाओं या अभिनय से जुड़ें अर्थों को व्यक्त करते हैं) को प्रदर्शित करने में निपुण थीं। इस प्रकार कई बार कृष्ण और गोपियाँ आपस में अपने बँधे हुए हाथों को कलात्मक रूप से एक साथ हिलाते थे, और कई बार वे हाथों को अलग करके गाने के अर्थ को अभिनय करने के लिए मुद्राएँ प्रदर्शित करते थे|
'पाद-न्यासैः' शब्द इंगित करता है कि गोपियाँ अपने नृत्य के पैरों की चाल को एक आकर्षक ढंग से कलात्मक और शालीनता से रखती थीं, और 'स-स्मितैः भ्रू-विलासैः' शब्द बताते हैं कि प्रेम से मुस्कुराती हुई उनकी भौंहों की रोमांटिक हरकतें देखने में बहुत ही मनोहारी थीं|
