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श्लोक 10.33.39  |
विक्रीडितं व्रजवधूभिरिदं च विष्णो:
श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् य: ।
भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं
हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीर: ॥ ३९ ॥ |
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| अनुवाद |
| वृन्दावन की गोपियों के साथ भगवान् की क्रीड़ाओं को जो कोई भी श्रद्धा से सुनता या वर्णन करता है, वह भगवान् की शुद्ध भक्ति को प्राप्त करता है। इस प्रकार वह शीघ्र ही धीरजवान होकर हृदय रोग रूपी कामवासना को जीत लेता है। |
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| वृन्दावन की गोपियों के साथ भगवान् की क्रीड़ाओं को जो कोई भी श्रद्धा से सुनता या वर्णन करता है, वह भगवान् की शुद्ध भक्ति को प्राप्त करता है। इस प्रकार वह शीघ्र ही धीरजवान होकर हृदय रोग रूपी कामवासना को जीत लेता है। |
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| इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दस के अंतर्गत तैंतीसवाँ अध्याय समाप्त होता है । |
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