श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 33: रास नृत्य  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  10.33.37 
नासूयन् खलु कृष्णाय मोहितास्तस्य मायया ।
मन्यमाना: स्वपार्श्वस्थान्स्वान्स्वान्दारान् व्रजौकस: ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
कृष्ण की मायावी शक्ति के मोहपाश में बँधे सभी ग्वालों ने यह सोचा कि उनकी पत्नियाँ सदैव उनके घरों में ही रहती थीं। इस तरह उन्हें कृष्ण के प्रति किसी तरह की ईर्ष्या का भाव उत्पन्न नहीं हुआ।
 
All the cowherds, fascinated by Krishna's magical powers, thought that their wives were staying close to them in their homes. Thus, they did not develop any jealousy towards Krishna.
तात्पर्य
क्योंकि गोपियाँ कृष्ण के अतिरिक्त किसी से प्रेम नहीं करती थीं, योग-माया ने हर समय भगवान के साथ उनके संबंधों की रक्षा की, भले ही उनका विवाह हो गया था। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती उज्ज्वल-नीलमणि से निम्नानुसार उद्धृत करते हैं:

माया-कल्पिता तद्रिक-स्त्री

शीलनेनानुसूयभीः

न जातु व्रजदेवीनां

पतिभिः सह संगमः

"गोपियों के ईर्ष्यालु पति अपनी पत्नियों के साथ नहीं, बल्कि माया द्वारा निर्मित युगल के साथ सहवास करते थे। इस प्रकार इन पुरुषों का व्रज की दिव्य महिलाओं के साथ कभी भी वास्तव में कोई अंतरंग संपर्क नहीं हुआ।" गोपियां भगवान की आंतरिक ऊर्जा हैं और वे कभी भी किसी अन्य जीव की नहीं हो सकतीं। कृष्ण ने परकीया-रस, विवाहित महिला और उसके प्रेमी के बीच प्रेम- की उत्तेजना पैदा करने के लिए दूसरे पुरुषों से उनका कथित विवाह व्यवस्थित किया। ये गतिविधियाँ पूर्ण रूप से पवित्र हैं क्योंकि वे भगवान के मनोरंजन हैं और पुरातन काल से संतों ने इन सर्वोच्च आध्यात्मिक घटनाओं का आनंद लिया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)