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bhagavat 10.33.34: जो भक्तगण भगवान के चरणकमलों की धूल का सेवन कर पूर्णरूपेण संतुष्ट रहते हैं, उन्हें भौतिक कर्म कभी नहीं बांधते। और न ही भौतिक कर्म उन बुद्धिमान मुनियों को बांध पाते हैं, जिन्होंने योगशक्ति के द्वारा अपने को समस्त कर्मफलों के बंधन से मुक्त कर लिया है। तो फिर स्वयं भगवान के बंधन का प्रश्न कहां उठ सकता है, जो अपनी इच्छानुसार दिव्य रूप धारण करने वाले हैं?   |   bhagavat अध्याय 10.33: रास नृत्य   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 33: रास नृत्य  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  10.33.34 
यत्पादपङ्कजपरागनिषेवतृप्ता
योगप्रभावविधुताखिलकर्मबन्धा: ।
स्वैरं चरन्ति मुनयोऽपि न नह्यमाना-
स्तस्येच्छयात्तवपुष: कुत एव बन्ध: ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
जो भक्तगण भगवान के चरणकमलों की धूल का सेवन कर पूर्णरूपेण संतुष्ट रहते हैं, उन्हें भौतिक कर्म कभी नहीं बांधते। और न ही भौतिक कर्म उन बुद्धिमान मुनियों को बांध पाते हैं, जिन्होंने योगशक्ति के द्वारा अपने को समस्त कर्मफलों के बंधन से मुक्त कर लिया है। तो फिर स्वयं भगवान के बंधन का प्रश्न कहां उठ सकता है, जो अपनी इच्छानुसार दिव्य रूप धारण करने वाले हैं?
 
Material activities can never bind those devotees who are completely satisfied by partaking of the dust of the Lord's lotus feet. Neither can material activities bind those wise sages who have freed themselves from the bondage of all karmic reactions by the power of yoga. Then where does the question of bondage of the Lord Himself arise, who is about to assume a divine form at will?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)