श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 33: रास नृत्य  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  10.33.29 
श्रीशुक उवाच
धर्मव्यतिक्रमो द‍ृष्ट ईश्वराणां च साहसम् ।
तेजीयसां न दोषाय वह्ने: सर्वभुजो यथा ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: किसी भी स्पष्ट साहसपूर्ण नैतिक उल्लंघन से जो हम शक्तिशाली नियंत्रकों में देख सकते हैं, उनका दर्जा हानिग्रस्त नहीं होता, क्योंकि वे उस अग्नि के समान हैं जो उसमें डाली गई हर वस्तु को भस्म कर देती है और स्वयं अपवित्र नहीं होती।
 
Sukadeva Goswami said: The position of the powerful controllers is not affected by any apparent daring transgression that we may observe in them, for they are like the fire which swallows up everything and remains uncontaminated.
तात्पर्य
महान और समर्थ पुरुषों की प्रतिष्ठा नैतिक सिद्धांतों के उल्लंघन से नष्ट नहीं होती। श्रीधर स्वामी ने ब्रह्मा, इंद्र, सोम, विश्वामित्र और अन्य लोगों के उदाहरणों का उल्लेख किया है। अग्नि उस सबका उपभोग कर जाती है जो इसमें डाला जाता है, परन्तु अग्नि का स्वरूप नहीं बदलता। इसी प्रकार, महान व्यक्तित्व, अपने व्यवहार में अनियमित होने के कारण, अपने स्थान से नहीं गिरते। हालाँकि, निम्नलिखित श्लोक में, शुकदेव गोस्वामी यह स्पष्ट करते हैं कि यदि हम ब्रह्माण्ड पर शासन करने वाले महान व्यक्तित्वों की नकल करने का प्रयास करते हैं, तो परिणाम विनाशकारी होगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)