एवं शशाङ्कांशुविराजिता निशा:
स सत्यकामोऽनुरताबलागण: ।
सिषेव आत्मन्यवरुद्धसौरत:
सर्वा: शरत्काव्यकथारसाश्रया: ॥ २५ ॥
अनुवाद
यद्यपि गोपियाँ सत्यकाम कृष्ण के प्रति दृढ़तापूर्वक अनुरक्त थीं और कृष्ण की इच्छाएँ सदा पूरी होती थीं , फिर भी भगवान् के मन में कभी कोई काम-भावना नहीं जागी। फिर भी, अपनी लीलाओं को सम्पन्न करने के लिए भगवान् ने उन चांदनी से खिली शरद ऋतु की रातों का लाभ उठाया जो दिव्य विषयों के काव्यमय वर्णन के लिए प्रेरणा देती हैं।
Although the gopis were deeply attached to Satyakama Krishna, inwardly the Lord was not affected by any worldly passion. Still, He took advantage of all those moonlit autumn nights to perform His pastimes, which inspire poetic descriptions of transcendental themes.
तात्पर्य
रस शब्द का अंग्रेजी में अनुवाद करना कठिन है, जो कि भगवान कृष्ण के साथ प्रेममय संबंध से प्राप्त आध्यात्मिक आनंद का संकेत करता है। यह आनंद भगवान और उनके भक्तों के साथ आध्यात्मिक लीलाओं के बीच अनुभव किया जाता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती बताते हैं कि व्यास, पराशर, जयदेव, लीलाशुक (बिल्वमंगल ठाकुर), गोवर्धनआचार्य और श्रील रूप गोस्वामी जैसे महान वैष्णव कवियों ने अपनी कविता में भगवान के संयुग्म मामलों का वर्णन करने का प्रयास किया है। हालाँकि, ये वर्णन कभी भी पूर्ण नहीं होते हैं, क्योंकि भगवान के कार्य असीमित हैं; इस प्रकार ऐसे कार्यों की महिमा करने का प्रयास अभी भी जारी है और हमेशा जारी रहेगा। भगवान कृष्ण ने अपने प्रेममय मामलों को बढ़ाने के लिए सुंदर शरद ऋतु की रातों का एक असाधारण मौसम बनाया, और उन शरद ऋतु की रातों ने प्राचीन काल से ही पारलौकिक कवियों को प्रेरित किया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥