भजतोऽपि न वै केचिद् भजन्त्यभजत: कुत: ।
आत्मारामा ह्याप्तकामा अकृतज्ञा गुरुद्रुह: ॥ १९ ॥
अनुवाद
फिर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आध्यात्मिक तौर पर संतुष्ट हैं, सांसारिक दृष्टि से संपन्न हैं, या स्वभाव से कृतघ्न हैं या सहज ही श्रेष्ठ लोगों से ईर्ष्या करने वाले होते हैं। ऐसे लोग उन लोगों से भी प्रेम नहीं करते जो उनसे प्रेम करते हैं, तो फिर जो शत्रुता रखते हैं, उनके लिए क्या कहा जा सकता है?
Then there are some people who are spiritually self-satisfied, materially full, or ungrateful by nature, or naturally jealous of superior people. Such people do not even love those who love them, so what about those who are hostile?
तात्पर्य
कुछ लोग आध्यात्मिक रूप से आत्म-संतुष्ट होते हैं, वे दूसरों के प्रेम का प्रतिदान नहीं करते क्योंकि वे सांसारिक मामलों में उलझना नहीं चाहते हैं। अन्य व्यक्ति केवल ईर्ष्या या अहंकार के कारण प्रतिदान नहीं करते हैं। और फिर भी अन्य प्रतिदान करने में विफल रहते हैं क्योंकि वे भौतिक रूप से संतुष्ट हैं और इस प्रकार नए भौतिक अवसरों में कोई दिलचस्पी नहीं है। भगवान कृष्ण इन सभी चीजों को धैर्यपूर्वक गोपियों को समझाते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥