तत्रोपविष्टो भगवान् स ईश्वरो
योगेश्वरान्तर्हृदि कल्पितासन: ।
चकास गोपीपरिषद्गतोऽर्चित-
स्त्रैलोक्यलक्ष्म्येकपदं वपुर्दधत् ॥ १४ ॥
अनुवाद
जिन भगवान श्रीकृष्ण के लिए बड़े-बड़े योगी लोग अपने हृदय में आसन की व्यवस्था करते हैं, वही श्रीकृष्ण गोपियों की सभा में आसन ग्रहण करने को तैयार हो गए। उनका दिव्य शरीर, जो तीनों लोकों में सुंदरता और ऐश्वर्य का एकमात्र निवास है, गोपियों द्वारा उनकी पूजा किए जाने पर और भी जगमगा उठा।
The same Lord Krishna for whom the great yogis arrange a seat in their hearts sat on the seat in the assembly of the gopis. His divine body, which is the only abode of beauty and opulence in the three worlds, shone brightly when the gopis worshipped Krishna.
तात्पर्य
मंत्र साधना में निष्णातों में भगवान शिव, अनंत शेष और अन्य उच्च कोटि के व्यक्तित्व हैं जो सब भगवान को अपने हृदय रूपी कमल पर बैठाते हैं। वही स्वामी गोपियों के अनन्य, निःस्वार्थ प्रेम के वशीभूत होकर उनके आग्रह पर प्रेमी बनकर यमुना के तट पर उनकी सुगंधित ओढ़नियों पर विराजमान होकर वृन्दावन में नृत्य करने के लिए सहमत हुए थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥