श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 32: पुन: मिलाप  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  10.32.13 
तद्दर्शनाह्लादविधूतहृद्रुजो
मनोरथान्तं श्रुतयो यथा ययु: ।
स्वैरुत्तरीयै: कुचकुङ्कुमाङ्कितै-
रचीक्लृपन्नासनमात्मबन्धवे ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
अपने सामने प्रत्यक्ष वेद स्वरूप कृष्ण के दर्शन से गोपियों का हृदय-दर्द शांत हो गया और उन्हें लगा कि उनकी सभी इच्छाएँ पूरी हो गई हैं। उन्होंने अपने प्रिय मित्र कृष्ण के लिए अपनी ओढ़नियों से, जो उनके स्तनों के कुंकुम से रंगी हुई थीं, आसन बनाया।
 
The joy of seeing Krishna in the form of Vedas in front of them soothed the pain in the hearts of the gopis and they felt that all their wishes had been fulfilled. They made a seat for their dear friend Krishna from their shawls, which were stained with kumkum from their breasts.
तात्पर्य
इस गान के अस्सी सातवें अध्याय (श्‍लोक 23) में श्रुतयें अथवा वेदों का मानवीय रूप इस प्रकार प्रार्थना करते हैं:

स्त्रिय उरगेंद्र-भोग-भुज-दंड-विषक्त-धियो

वयं अपि ते समाः समदृशोऽंघ्रि-सरोज-सुधाः

"वे स्त्रियां पूर्णतः अपने चित्त को भगवान श्री कृष्ण की ताकतवर भुजाओं में लगा देती हैं, जोकि महान नागों के शरीर के समान होती हैं। हम भी गोपियों के समान बनना चाहते हैं और उनके कमल के चरणों की सेवा करना चाहते हैं।" श्रुतियों ने ब्रह्मा के पिछले दिन में उनके प्रकट होने के दौरान कृष्ण को देखा था और उनके साथ जुड़ने की सबसे गहन इच्छा से पूर्ण हो गए थे। फिर इस कल्प में वे गोपियां बनीं। और चूंकि वेद मानव समाज में शाश्वत होते हैं, इस कल्प में भी श्रुतियों में कृष्ण की इच्छा पूर्ण हो जाएगी और अगले कल्प में भी वे गोपियां बनेंगी। यह जानकारी श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने दी है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)