व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते
वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम् ।
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां
स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम् ॥ १८ ॥
अनुवाद
हे प्रियतम, आपके पावन अवतरण ने व्रज के वनों में रहने वालों के कष्ट दूर कर दिए हैं। हमारे मन आपके सहवास के लिए लालायित हैं। कृपया हमें थोड़ी सी औषधि दीजिए, जो आपके भक्तों के दिल की बीमारी को दूर करती है।
O beloved, Your all-auspicious appearance removes the suffering of those who live in the forests of Vraja. Our minds yearn for Your proximity. Please give us a little of that medicine which alleviates the disease of the hearts of Your devotees.
तात्पर्य
आचार्यों के अनुसार, गोपियाँ पुन: प्रभु कृष्ण से प्रार्थना करती रहती हैं कि वो अपने चरण पद्म उनके वक्षों पर रखें. गोपियाँ मैटीरियल इच्छाओं की शिकार नहीं हैं, बल्कि वो परमात्मा से शुद्ध प्रेम में तल्लीन हैं और इस तरह प्रभु कृष्ण के चरण पद्मों की सेवा अपने खूबसूरत स्तनों को उन्हें अर्पित करके करना चाहती हैं. भौतिकवादी लोग, जो सांसरिक यौन इच्छाओं के शिकार हैं, ये नहीं समझ पाएंगे कि ये दांपत्य भावनाएँ शुद्ध, आध्यात्मिक जगत पर कैसे घटित होती हैं और यही भौतिकवादियों का दुर्भाग्य है.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥