ततो गत्वा वनोद्देशं दृप्ता केशवमब्रवीत् ।
न पारयेऽहं चलितुं नय मां यत्र ते मन: ॥ ३७ ॥
अनुवाद
जब दोनों प्रेमी वृन्दावन जंगल के एक भाग से गुजर रहे थे, तो विशेष गोपी अपने आप पर गर्व करने लगी। उसने भगवान् केशव से कहा, "मैं और नहीं चल सकती। मुझे जहाँ भी ले जाना हो, उठाकर ले जाइए।"
When the two lovers were passing through a part of the Vrindavan forest, the special gopi became proud of herself. She said to Lord Keshav, “I cannot walk any longer. Please pick me up and carry me wherever you wish to go.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥