ततश्च शौरिर्भगवत्प्रचोदित:
सुतं समादाय स सूतिकागृहात् ।
यदा बहिर्गन्तुमियेष तर्ह्यजा
या योगमायाजनि नन्दजायया ॥ ४७ ॥
अनुवाद
तत्पश्चात्, जब वसुदेव भगवान् के आशीर्वाद से नवजात शिशु को प्रसव कक्ष से उठाने वाले थे, ठीक उसी समय भगवान् की आध्यात्मिक शक्ति योगमाया ने महाराज नंद की पत्नी की पुत्री के रुप में जन्म लिया।
Thereafter, with the inspiration of God, when Vasudev was about to take away the new born child from the nursery, at that very moment, Yogamaya, the spiritual power of God, took birth as the daughter of Maharaj Nanda's wife.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि कृष्ण एक साथ देवकी के पुत्र के रूप में और योग-माया के साथ यशोदा के पुत्र के रूप में प्रकट हुए। देवकी के पुत्र के रूप में, वह पहले विष्णु के रूप में प्रकट हुए, और क्योंकि वसुदेव कृष्ण के प्रति शुद्ध स्नेह की स्थिति में नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र की भगवान विष्णु के रूप में पूजा की। हालाँकि, यशोदा ने अपने पुत्र कृष्ण को उनके भगवान होने की समझ के बिना ही प्रसन्न किया। यशोदा के पुत्र के रूप में और देवकी के पुत्र के रूप में कृष्ण के बीच का यही अंतर है। यह हरिवंश के अधिकार पर विश्वनाथ चक्रवर्ती द्वारा समझाया गया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥