श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 3: कृष्ण जन्म  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  10.3.45 
युवां मां पुत्रभावेन ब्रह्मभावेन चासकृत् ।
चिन्तयन्तौ कृतस्‍नेहौ यास्येथे मद्गतिं पराम् ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
तुम पति-पत्नी सदैव अपने पुत्र के रूप में मुझे स्मरण रखते हो, लेकिन यह भी हमेशा ध्यान रखते हो कि मैं परमेश्वर हूँ। इस प्रकार निरंतर स्नेहपूर्वक मुझे स्मरण करते हुए तुम्हें सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त होगी: भगवान के घर वापसी।
 
You husband and wife constantly think of Me as your son, but you know that I am the Supreme Personality of Godhead. By thinking of Me in this way constantly with love, you will attain the highest perfection, that is, you will return to the abode of Godhead.
तात्पर्य
भगवान के व्यक्तित्व से सदैव जुड़े माता -पिता को भगवान का यह उपदेश विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो घर लौटने यानी भगवान के पास वापस जाने के लिए उत्सुक हैं। सर्वोच्च व्यक्ति रूप भगवान को कभी भी एक साधारण इंसान की तरह नहीं समझना चाहिए जैसा कि नास्तिक करते हैं। स्वयं भगवान सर्वोच्च व्यक्ति रूप में कृष्ण ने सभी मानव समाज के कल्याण हेतु अवतार लिया और अपना उपदेश छोड़ा। इस दुर्भाग्य है कि मूर्ख और बदमाश उन्हें एक साधारण व्यक्ति के रूप में ही समझते हैं और भगवद-गीता के निर्देशों को अपने इन्द्रियतृप्ति हेतु विपरीत रूप से लेते हैं। व्यावहारिक रूप से हर कोई जो भगवद-गीता की व्याख्या करता है, वह इन्द्रिय सुख के लिए ही करता है। आधुनिक विद्वानों और राजनीतिज्ञों के लिए यह विशेष रूप से एक फैशन बन गया है कि भगवद-गीता को वे ऐसे समझते हैं जैसे कि यह कोई काल्पनिक चीज हो। और अपनी त्रुटिपूर्ण व्याख्याओं से वह अपने और जनता के करियर को नुकसान पहुंचाते हैं। हालाँकि, कृष्ण भावना आंदोलन इस सिद्धांत से लड़ रहा है कि कृष्ण एक काल्पनिक पात्र हैं और कुरुक्षेत्र में युद्ध नहीं हुआ था, सब कुछ प्रतीकात्मक है और भगवद-गीता में कुछ भी सत्य नहीं है। किसी भी मामले में, यदि कोई वास्तव में सफल होना चाहता है, तो वह भगवद-गीता के पाठ को वैसे ही पढ़कर सफलता प्राप्त कर सकता है जैसे कि वह है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने विशेष रूप से भगवद-गीता के निर्देशों पर बल दिया: 'यारे देख, तारे कह कृष्ण उपदेश'। यदि कोई जीवन में सर्वोच्च सफलता प्राप्त करना चाहता है, तो उसे सर्वोच्च भगवान द्वारा बोली गई भगवद-गीता को स्वीकार करना चाहिए। इस प्रकार भगवद-गीता को स्वीकार करके, पूरा मानव समाज परिपूर्ण और सुखी बन सकता है। यह ध्यान देने योग्य है कि वसुदेव और देवकी जब कृष्ण को नंद महाराज के निवास गोकुल में ले जाया गया था तो उनसे अलग हो जाएँगे तथा भगवान ने स्वयं उन्हें निर्देश दिया कि उन्हें हमेशा उन्हें अपने बेटे के रूप में और सर्वोच्च व्यक्ति रूप भगवान के रूप में ही समझना चाहिए। इससे उनका उनसे संपर्क बना रहेगा। ग्यारह साल बाद, भगवान मथुरा में उनके बेटे के रूप में लौटेंगे और इसलिए अलग होने का कोई प्रश्न नहीं था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)