तृतीयेऽस्मिन् भवेऽहं वै तेनैव वपुषाथ वाम् ।
जातो भूयस्तयोरेव सत्यं मे व्याहृतं सति ॥ ४३ ॥
अनुवाद
हे पूजनीय पवित्र माता, जो वही व्यक्तित्व हूं, अब तीसरी बार तुम दोनों के पुत्र रूप में प्रकट हुआ हूं। मेरे शब्दों को सत्य मानो।
O supreme Sati Mata, I the same person have now appeared for the third time in the form of the son of both of you. Consider my words to be true.
तात्पर्य
सर्वोच्च भगवान ईश्वर एक माता और पिता को चुनते हैं जिससे बार-बार जन्म लेते हैं। सबसे पहले भगवान ने सुतापा और पृष्णी से जन्म लिया, उसके बाद कश्यप और अदिति से, और एक बार फिर उन्हीं माता-पिता से, वासुदेव और देवकी से। भगवान ने कहा "अन्य अवतारों में भी," "मैंने एक साधारण बच्चे का रूप धारण किया ताकि तुम्हारा पुत्र बन सकूं जिससे हम कभी न खत्म होने वाले प्रेम का आदान-प्रदान कर सकें।" जीव गोस्वामी ने अपने कृष्ण-संदर्भ, नब्बेवें अध्याय में इस श्लोक की व्याख्या की है, जहाँ उन्होंने उल्लेख किया है कि "श्लोक 37" में भगवान कहते हैं, अमुना वपुषा, जिसका अर्थ है "इस रूप से।" दूसरे शब्दों में, भगवान ने देवकी से कहा, "इस बार मैं अपने मूल रूप में श्री कृष्ण के रूप में आया हूँ।" श्रील जीव गोस्वामी कहते हैं कि अन्य रूप भगवान के मूल रूप के आंशिक विस्तार थे, लेकिन पृष्णी और सुतापा द्वारा विकसित गहन प्रेम के कारण, भगवान श्री कृष्ण के रूप में अपनी पूर्ण संपन्नता में देवकी और वसुदेव से प्रकट हुए। इस श्लोक में भगवान पुष्टि करते हैं, "मैं सर्वोच्च भगवान ईश्वर ही हूँ, लेकिन मैं श्री कृष्ण के रूप में पूर्ण संपन्नता से प्रकट होता हूँ।" ये तेनैव वपुषा शब्दों का आशय है। जब भगवान ने पृश्निगर्भ के जन्म का उल्लेख किया, तो उन्होंने तेनैव वपुषा नहीं कहा, लेकिन उन्होंने देवकी को आश्वासन दिया कि तीसरे जन्म में सर्वोच्च भगवान ईश्वर कृष्ण प्रकट हुए थे, उनका आंशिक विस्तार नहीं। पृश्निगर्भ और वामन कृष्ण के आंशिक विस्तार थे, लेकिन इस तीसरे जन्म में स्वयं कृष्ण प्रकट हुए थे। श्रील जीव गोस्वामी द्वारा श्री कृष्ण-संदर्भ में दी गई यह व्याख्या है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥