निष्किञ्चनस्य भगवद्-भजनोन्मुखस्य
पारं परं जिगमिषोर्भव-सागरस्य
(च.च. मध्य 11.8)
यदि कोई घर, भगवान के पास वापस जाना चाहता है, तो उसे माया से रहित होना चाहिए। इसलिए, भगवान के यहां आने और अपना पुत्र बनने की इच्छा रखने के बजाय, व्यक्ति को सभी भौतिक इच्छाओं (अन्याभिलाषिता-शून्यम) से मुक्त होने और घर वापस लौटने की इच्छा रखनी चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु हमें अपने शिक्षाष्टक में सिखाते हैं:
न धनं न जनं न सुन्दरीं
कवितां वा जगदीश कामये
मम जन्मनि जन्मानीश्वरे
भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि
"हे सर्वशक्तिमान प्रभु, मुझे धन संचय करने की कोई इच्छा नहीं है, न ही मुझे सुंदर महिलाओं की इच्छा है, न ही मुझे किसी भी अनुयायी की आवश्यकता है। मैं केवल आपकी अकारण भक्ति सेवा चाहता हूं, जन्मों-जन्मों तक। ” भौतिक रूप से कलंकित इच्छाओं को पूरा करने के लिए भगवान से नहीं पूछना चाहिए।
