श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 3: कृष्ण जन्म  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  10.3.39 
अजुष्टग्राम्यविषयावनपत्यौ च दम्पती ।
न वव्राथेऽपवगन मे मोहितौ देवमायया ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
पति और पत्नी होते हुए और हमेशा निःसंतान रहने से आप लोग विषयासक्त हो गए क्योंकि परमात्मा के प्यार के प्रभाव अर्थात अनुराग के कारण आप लोग मुझे अपने बेटे के रूप में पाना चाहते थे इसलिए आप लोगो ने कभी भी इस संसार से मुक्ति नहीं चाही |
 
Being childless as husband and wife, you were attracted towards worldly life because due to the influence of Devmaya i.e. divine love, you wanted to have me as your son, that is why you never wanted to be free from this world.
तात्पर्य
वसुदेव और देवकी सुतपा और पृश्नि के समय से ही दम्पति थे, पति और पत्नी, और वे पति-पत्नी बने रहना चाहते थे ताकि भगवान का परम व्यक्तित्व उनका पुत्र बन सके। यह आसक्ति देवमाया के प्रभाव से हुई। कृष्ण को अपने पुत्र के रूप में प्यार करना एक वैदिक सिद्धांत है। वसुदेव और देवकी कभी भी भगवान को अपने पुत्र के रूप में पाने के अलावा और कुछ नहीं चाहते थे, फिर भी इस उद्देश्य के लिए वे स्पष्ट रूप से कामुक भोग के लिए साधारण गृहस्थों की तरह जीना चाहते थे। हालांकि यह आध्यात्मिक शक्ति का लेन-देन था, उनकी इच्छा वैवाहिक जीवन में यौन संबंध के लिए लगाव की तरह प्रतीत होती है। यदि कोई घर, भगवान के पास वापस जाना चाहता है, तो उसे ऐसी इच्छाओं को छोड़ देना चाहिए। यह तभी संभव है जब भगवान के परम व्यक्तित्व के लिए प्रगाढ़ प्रेम विकसित हो। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा है:

निष्किञ्चनस्य भगवद्-भजनोन्मुखस्य

पारं परं जिगमिषोर्भव-सागरस्य

(च.च. मध्य 11.8)

यदि कोई घर, भगवान के पास वापस जाना चाहता है, तो उसे माया से रहित होना चाहिए। इसलिए, भगवान के यहां आने और अपना पुत्र बनने की इच्छा रखने के बजाय, व्यक्ति को सभी भौतिक इच्छाओं (अन्याभिलाषिता-शून्यम) से मुक्त होने और घर वापस लौटने की इच्छा रखनी चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु हमें अपने शिक्षाष्टक में सिखाते हैं:

न धनं न जनं न सुन्दरीं

कवितां वा जगदीश कामये

मम जन्मनि जन्मानीश्वरे

भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि

"हे सर्वशक्तिमान प्रभु, मुझे धन संचय करने की कोई इच्छा नहीं है, न ही मुझे सुंदर महिलाओं की इच्छा है, न ही मुझे किसी भी अनुयायी की आवश्यकता है। मैं केवल आपकी अकारण भक्ति सेवा चाहता हूं, जन्मों-जन्मों तक। ” भौतिक रूप से कलंकित इच्छाओं को पूरा करने के लिए भगवान से नहीं पूछना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)