श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 3: कृष्ण जन्म  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  10.3.34-35 
वर्षवातातपहिमघर्मकालगुणाननु ।
सहमानौ श्वासरोधविनिर्धूतमनोमलौ ॥ ३४ ॥
शीर्णपर्णानिलाहारावुपशान्तेन चेतसा ।
मत्त: कामानभीप्सन्तौ मदाराधनमीहतु: ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
प्रिय माँ-बाप, आप लोगों ने अलग-अलग मौसमों के हिसाब से बारिश, तूफ़ान, कड़ी धूप और कड़ाके की ठंड, हर तरह की मुसीबतें सही हैं। शरीर के अंदर की हवा को रोकने के लिए प्राणायाम करके और बस हवा और पेड़ों से गिरे सूखे पत्ते खाकर अपने मन से सारी गंदगी को साफ कर दिया। इस तरह मेरे वरदान की इच्छा से तुम लोगों ने शांत चित्त से मेरी पूजा की।
 
O parents, you endured all kinds of discomforts according to the different seasons - rain, storm, scorching sun and bitter cold. You cleansed your mind of all impurities by performing pranayama to stop the wind inside the body and by eating only air and dry leaves fallen from the trees. In this way, by desiring my boon, you worshipped me with a calm mind.
तात्पर्य
वासुदेव और देवकी ने सर्वोच्च भगवान को अपना पुत्र बहुत आसानी से नहीं पाया, और न ही सर्वोच्च भगवान किसी को भी केवल अपने पिता और माता के रूप में स्वीकार करते हैं। यहाँ हम देख सकते हैं कि वासुदेव और देवकी ने कृष्ण को कैसे अपना शाश्वत पुत्र प्राप्त किया। हमारे अपने जीवन में, हम अच्छे बच्चे पाने के लिए यहाँ बताए गए सिद्धांतों का पालन करने के लिए बने हैं। बेशक, हर किसी के लिए कृष्ण को अपने पुत्र के रूप में प्राप्त करना संभव नहीं है, लेकिन कम से कम मानव समाज के लाभ के लिए व्यक्ति बहुत अच्छे पुत्र और पुत्रियाँ प्राप्त कर सकता है। भगवद-गीता में कहा गया है कि यदि मनुष्य आध्यात्मिक जीवन का पालन नहीं करते हैं, तो वर्ण-संकर जनसंख्या में वृद्धि होगी, बिल्ली और कुत्तों की तरह पैदा होने वाली जनसंख्या, और पूरी दुनिया नरक की तरह हो जाएगी। कृष्ण चेतना का अभ्यास नहीं करना बल्कि जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए केवल कृत्रिम साधनों को प्रोत्साहित करना व्यर्थ होगा; जनसंख्या बढ़ेगी, और इसमें वर्ण-संकर, अवांछित संतान शामिल होगी। लोगों को यह सिखाना बेहतर है कि वे सूअरों और कुत्तों की तरह बच्चे पैदा न करें, बल्कि नियंत्रित जीवन में रहें।

मानव जीवन सुअर या कुत्ते बनने के लिए नहीं है, बल्कि तपो दिव्यम, पारलौकिक तपस्या के लिए है। प्रत्येक व्यक्ति को तपस्या, तपस्या करना सिखाया जाना चाहिए। हालाँकि पृश्नि और सुतपा जैसी तपस्या करना संभव न हो, फिर भी शास्त्र ने तपस्या की एक विधि का अवसर दिया है जो बहुत आसान है - संकीर्तन आंदोलन। कोई भी कृष्ण को अपने बच्चे के रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या करने की अपेक्षा नहीं कर सकता है, फिर भी केवल हरे कृष्ण महा-मंत्र (कीर्तनाद एवा कृष्णस्य) का जाप करने से, व्यक्ति इतना पवित्र हो सकता है कि वह इस भौतिक दुनिया के सभी संदूषण से मुक्त हो जाता है (मुक्ता-संघ) और अपने घर वापस चला जाता है, भगवान के पास वापस जाता है (परम वृजेट)। इसलिए, कृष्ण चेतना आंदोलन लोगों को खुशी के कृत्रिम साधनों को अपनाने के लिए नहीं, बल्कि शास्त्र में बताए गए खुशी के वास्तविक मार्ग पर चलने के लिए - हरे कृष्ण मंत्र का जाप करने के लिए - और भौतिक अस्तित्व के हर पहलू में पूर्ण होने की शिक्षा दे रहा है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)