श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 3: कृष्ण जन्म  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  10.3.31 
विश्वं यदेतत् स्वतनौ निशान्ते
यथावकाशं पुरुष: परो भवान् ।
बिभर्ति सोऽयं मम गर्भगोऽभू-
दहो नृलोकस्य विडम्बनं हि तत् ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
प्रलय की घड़ी में समस्त सृष्टि, जो चेतन और जड़ से बनी है, आपके दिव्य शरीर में समा जाती है और बिना किसी परेशानी के वहीं ठहरती है। लेकिन अब वही दिव्य रूप मेरे गर्भ से जन्म ले चुका है। क्या लोग इस पर यकीन करेंगे, या वे मुझे हँसी का पात्र बना देंगे?
 
At the time of destruction, all creations consisting of moving and immovable beings enter your divine body and remain there without any difficulty. But now the same divine form has taken birth from my womb. People will not believe this and I will become a laughing stock.
तात्पर्य
जैसे कि चैतन्य-चरितामृत में बताया गया है, भगवान को दिया जाने वाला प्रेममय सेवा दो प्रकार की होती है: ऐश्वर्य-पूर्ण, जो ओपुलेंस से पूर्ण होती है, और ऐश्वर्य-शीतल, जो बिना ओपुलेंस के होती है। भगवान से दिया जाने वाला वास्तविक प्रेम, ऐश्वर्य-शीतल से शुरू होता है, जो केवल शुद्ध प्रेम पर आधारित होता है।

प्रेमाञ्जन-चुरिता-भक्ति-विलोचनेन

सन्ताः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति

यं श्यामसुन्दरम चिंत्य-गुण-स्वरूपं

गोविन्दम आदि-पुरुषं तं अहं भजामि

(ब्रह्म-संहिता 5.38)

शुद्ध भक्त, जिनकी आँखों पर प्रेम का मरहम लगा हुआ होता है, वो भगवान को श्यामसुंदर और मुरलीधर के रूप में देखना चाहते हैं, जिसके दोनों हाथों में एक बाँसुरी है। ये वो रूप है जो वृंदावन के लोगों को उपलब्ध है, जो सभी भगवान से श्यामसुंदर के रूप में प्रेम करते हैं, न कि भगवान विष्णु, नारायण के रूप में, जिनकी वैकुंठ में पूजा की जाती है, जहाँ भक्त उनकी ओपुलेंस की प्रशंसा करते हैं। हालाँकि देवकी वृंदावन के प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं हैं, फिर भी वो वृंदावन के प्लेटफ़ॉर्म के पास हैं। वृंदावन के प्लेटफ़ॉर्म पर कृष्ण की माँ, माँ यशोदा हैं, और मथुरा और द्वारका के प्लेटफ़ॉर्म पर कृष्ण की माँ, देवकी हैं। मथुरा और द्वारका में भगवान के लिए प्रेम, उनकी ओपुलेंस की प्रशंसा के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन वृंदावन में भगवान की ओपुलेंस दिखाई नहीं पड़ती है।

भगवान को दिया जाने वाला प्रेममय सेवा के पाँच चरण होते हैं - शांता, दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य। देवकी वात्सल्य के प्लेटफ़ॉर्म पर हैं। वो अपने शाश्वत पुत्र, कृष्ण के साथ प्रेम के इस चरण में रहना चाहती थीं, और इसलिए वो चाहती थीं कि भगवान अपना ओपुलेंट विष्णु रूप छोड़ दें। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इस तथ्य को इस कविता की अपनी व्याख्या में बहुत स्पष्ट रूप से बताते हैं।

भक्ति, भगवान और भक्त भौतिक जगत से संबंधित नहीं हैं। ये भगवद्गीता (14.26) में पुष्टि की गई है:

माम् च योऽव्यभिचारेण

भक्ति-योगेन सेवते

स गुणान समतीत्यैतान

ब्रह्म-भूयाय कल्पते

"जो व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के प्रेममय भक्ति में व्यस्त होता है वो तुरंत भौतिक जगत की अवस्थाओं को पार कर के आध्यात्मिक प्लेटफ़ॉर्म तक पहुँच जाता है।" भक्ति में किसी के व्यवहार की शुरुआत से ही, वो उस पारलौकिक प्लेटफ़ॉर्म पर स्थित हो जाता है। इसलिए वसुदेव और देवकी, जो कि एक पूर्ण रूप से पवित्र भक्तिपूर्ण अवस्था में स्थित हैं, इस भौतिक जगत से परे हैं और भौतिक भय के अधीन नहीं हैं। हालांकि पारलौकिक जगत में, शुद्ध भक्ति के कारण, भय की एक समान अवधारणा होती है, जो गहन प्रेम की वजह से होती है।

जैसे कि भगवद्गीता (भक्त्या मामभिनाति यावान यश्चस्मि तत्वतः) में कहा गया है और जैसा कि श्रीमद् भागवतम (भक्त्याहं एकया ग्राह्यः) में पुष्टि की गई है, बिना भक्ति के भगवान की आध्यात्मिक स्थिति को नहीं समझा जा सकता। भक्ति को तीन चरणों में माना जा सकता है, जिन्हें गुणी-भूत, प्रधान-भूत और केवल कहा जाता है, और इन चरणों के अनुसार तीन विभाग हैं, जिन्हें ज्ञान, ज्ञानमयी और रति, या प्रेम - यानी, साधारण ज्ञान, ज्ञान के साथ मिश्रित प्रेम, और शुद्ध प्रेम कहा जाता है। साधारण ज्ञान से, व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के पारलौकिक आनंद का अनुभव कर सकता है। इस धारणा को मान-भूति कहा जाता है। जब व्यक्ति ज्ञानमयी अवस्था में आता है, तो वो भगवान की पारलौकिक ओपुलेंस का अनुभव करता है। लेकिन जब व्यक्ति शुद्ध प्रेम को प्राप्त करता है, तो वो भगवान के पारलौकिक रूप को भगवान कृष्ण या भगवान राम के रूप में अनुभव करता है। यही चाहिए होता है। विशेष रूप से माधुर्य-रस में, व्यक्ति भगवान (श्री-विग्रह-निष्ठ-रूपादि) से जुड़ जाता है। फिर भगवान और भक्त के बीच प्रेममय व्यवहार शुरू होते हैं।

कृष्ण के हाथों में मुरली धारण करने के विशेष महत्त्व को व्रजभूमि यानी वृंदावन में माधुरी.. विराजते के रूप में वर्णित किया गया है। हाथों में मुरली धारण किए हुए भगवान का स्वरूप अत्यंत मनमोहक है, और सर्वाधिक और उत्कृष्ट रूप से आकर्षित होने वाली श्रीमती राधारानी, राधिका है। वह कृष्ण के साथ परमानंदपूर्ण संगति का अनुभव करती हैं। कभी-कभी लोग यह समझ नहीं पाते कि श्रीमद्-भागवतम में राधिका का नाम क्यों नहीं आया है। लेकिन वास्तव में, राधिका को आराधना शब्द से समझा जा सकता है, जो यह इंगित करता है कि वह कृष्ण के साथ सर्वोच्च प्रेमपूर्ण संवाद का आनंद लेती हैं। विष्णु को जन्म देने के कारण उपहास का पात्र नहीं बनना चाहती थी, देवकी कृष्ण को दो हाथों वाला चाहती थी, इसलिए उन्होंने भगवान से अपने रूप को बदलने का अनुरोध किया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)