श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 3: कृष्ण जन्म  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  10.3.27 
मर्त्यो मृत्युव्यालभीत: पलायन्‌
लोकान् सर्वान्निर्भयं नाध्यगच्छत् ।
त्वत्पादाब्जं प्राप्य यद‍ृच्छयाद्य
सुस्थ: शेते मृत्युरस्मादपैति ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
इस भौतिक संसार में कोई भी व्यक्ति जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और बीमारी—इन चार सिद्धांतों से मुक्त नहीं हो पाया, चाहे वो विभिन्न ग्रहों पर क्यों न भाग जाए। परन्तु हे प्रभु, अब चूँकि आप प्रकट हो चुके हैं इसलिए मृत्यु आपसे डरकर भाग रही है और सभी जीवों ने आपकी दया से आपके चरणकमलों की शरण प्राप्त करके पूर्ण मानसिक शांति की नींद सोई है।
 
In this material world no one can escape the four laws of birth, death, old age and disease, even if he flees to various worlds. But now that You have appeared, O Lord, death is fleeing from fear of You, and all living entities, by Your mercy, are taking shelter of Your lotus feet and sleeping in perfect mental peace.
तात्पर्य
जीवों की अलग श्रेणियाँ हैं, पर हर कोई मृत्यु से डरता है। कर्मियों का सर्वोच्च लक्ष्य उच्च स्वर्गीय लोकों में स्थानांतरित होना है, जहाँ जीवन की अवधि बहुत लंबी होती है। जैसे कि भागवदगीता (8.17) में कहा गया है, सहस्र-युग-पर्यंतं अहर यद् ब्रह्मणो विदुः: ब्रह्मा का एक दिन 1,000 युग के बराबर होता है, और प्रत्येक युग में 4,300,000 वर्ष होते हैं। समान रूप से, ब्रह्मा की रात 1,000 गुना 4,300,000 वर्षों के बराबर होती है। इस प्रकार, हम ब्रह्मा के महीने और वर्षों की गणना कर सकते हैं, लेकिन ब्रह्मा भी, जो लाखों-करोड़ों वर्षों तक जीवित रहते हैं (द्वि-परांर्ध-काल), उन्हें भी मरना होगा। वैदिक शास्त्र के अनुसार, उच्च ग्रह प्रणालियों के निवासी 10,000 वर्षों तक जीवित रहते हैं, और जिस प्रकार ब्रह्मा के दिन की गणना हमारे 4,300,000,000 वर्षों के बराबर की जाती है, उसी तरह उच्च ग्रह प्रणालियों में एक दिन हमारे छह महीनों के बराबर होता है। इसलिए कर्मी उच्च ग्रह प्रणालियों में स्थानांतरण का प्रयास करते हैं, लेकिन यह उन्हें मृत्यु से मुक्त नहीं कर सकता। इस भौतिक संसार में, ब्रह्मा से लेकर निकृष्टतम चींटी तक सभी को मरना होगा। इसलिए इस संसार को मृत्युलोक कहा जाता है। जैसे कृष्ण भागवद गीता (8.16) में कहते हैं, आब्रह्म-भुवनाल लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन: : जब तक कोई इस भौतिक संसार में है, चाहे वह ब्रह्मलोक पर हो या इस ब्रह्मांड के भीतर किसी अन्य लोक पर, उसे एक के बाद एक जीवन का काल-चक्र (भूतवा भूतवा प्रलीयते) से गुजरना होगा। लेकिन अगर कोई भगवान के पूर्ण व्यक्तित्व के पास लौटता है (यद् गत्वा न निवर्तन्ते), तो उसे समय की सीमा में फिर से प्रवेश करने की आवश्यकता नहीं है। इसलिए, भक्त जिन्होंने भगवान के चरण कमलों का आश्रय लिया है, वे भगवान के पूर्ण व्यक्तित्व से आए इस आश्वासन के साथ बहुत शांति से सो सकते हैं। जैसा कि भागवद गीता (4.9) में पुष्टि की गई है, त्यक्त्वा देहं पुनर् जन्म नैति: : वर्तमान शरीर को त्यागने के बाद, एक भक्त जो कृष्ण को समझ चुका है कि वे कौन हैं, उसे इस भौतिक संसार में वापस लौटने की आवश्यकता नहीं है। जीवों के लिए सांवैधानिक स्थिति अनंतता है (न हन्यते हन्यमाने शरीरे, नित्यः शाश्वतोऽयं)। प्रत्येक जीव अनादि है। लेकिन भौतिक जगत में गिरे होने के कारण, एक व्यक्ति ब्रह्मांड के भीतर भटकता रहता है, एक शरीर से दूसरे शरीर में लगातार बदलता रहता है। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं:

ब्रह्मांड भ्रमिते कोन भाग्यवान जीव

गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाया भक्ति-लता-बीज

(चै. मा. 19.151)

हर कोई इस ब्रह्मांड में ऊपर और नीचे भटक रहा है, लेकिन जो पर्याप्त रूप से भाग्यशाली है वह आध्यात्मिक गुरु की कृपा से कृष्ण चेतना के संपर्क में आता है, और भक्ति सेवा के मार्ग पर चलता है। तब उसे मृत्यु के भय के बिना, शाश्वत जीवन का आश्वासन मिलता है। जब कृष्ण प्रकट होते हैं, तो हर कोई मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है, फिर भी देवकी को लगा, "हम अभी भी कंस से डरते हैं, हालाँकि आप हमारे पुत्र के रूप में प्रकट हुए हैं।" वह कमोबेश घबराई हुई थी कि ऐसा क्यों होना चाहिए, और उसने भगवान से अपील की कि वह और वसुदेव को इस डर से मुक्त करें।

इस संबंध में, यह ध्यान दिया जा सकता है कि चंद्रमा स्वर्गीय ग्रहों में से एक है। वैदिक साहित्य से हम समझते हैं कि जो चंद्रमा पर जाता है उसे दस हजार वर्षों की अवधि का जीवन प्राप्त होता है जिसमें वह पवित्र कार्यों के फल का आनंद लेता है। यदि हमारे तथाकथित वैज्ञानिक चंद्रमा पर जा रहे हैं, तो उन्हें यहां वापस क्यों आना चाहिए? हमें बिना किसी संदेह के यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि वे कभी भी चंद्रमा पर नहीं गए हैं। चंद्रमा पर जाने के लिए, पवित्र कार्यों की योग्यता होनी चाहिए। तभी वहां जाकर जी सकते हैं। यदि कोई चंद्रमा पर गया है, तो उसे इस ग्रह पर क्यों लौटना चाहिए, जहां जीवन बहुत कम अवधि का है?

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)