ब्रह्मांड भ्रमिते कोन भाग्यवान जीव
गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाया भक्ति-लता-बीज
(चै. मा. 19.151)
हर कोई इस ब्रह्मांड में ऊपर और नीचे भटक रहा है, लेकिन जो पर्याप्त रूप से भाग्यशाली है वह आध्यात्मिक गुरु की कृपा से कृष्ण चेतना के संपर्क में आता है, और भक्ति सेवा के मार्ग पर चलता है। तब उसे मृत्यु के भय के बिना, शाश्वत जीवन का आश्वासन मिलता है। जब कृष्ण प्रकट होते हैं, तो हर कोई मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है, फिर भी देवकी को लगा, "हम अभी भी कंस से डरते हैं, हालाँकि आप हमारे पुत्र के रूप में प्रकट हुए हैं।" वह कमोबेश घबराई हुई थी कि ऐसा क्यों होना चाहिए, और उसने भगवान से अपील की कि वह और वसुदेव को इस डर से मुक्त करें।
इस संबंध में, यह ध्यान दिया जा सकता है कि चंद्रमा स्वर्गीय ग्रहों में से एक है। वैदिक साहित्य से हम समझते हैं कि जो चंद्रमा पर जाता है उसे दस हजार वर्षों की अवधि का जीवन प्राप्त होता है जिसमें वह पवित्र कार्यों के फल का आनंद लेता है। यदि हमारे तथाकथित वैज्ञानिक चंद्रमा पर जा रहे हैं, तो उन्हें यहां वापस क्यों आना चाहिए? हमें बिना किसी संदेह के यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि वे कभी भी चंद्रमा पर नहीं गए हैं। चंद्रमा पर जाने के लिए, पवित्र कार्यों की योग्यता होनी चाहिए। तभी वहां जाकर जी सकते हैं। यदि कोई चंद्रमा पर गया है, तो उसे इस ग्रह पर क्यों लौटना चाहिए, जहां जीवन बहुत कम अवधि का है?
