श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 3: कृष्ण जन्म  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  10.3.24 
श्रीदेवक्युवाच
रूपं यत् तत् प्राहुरव्यक्तमाद्यं
ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम् ।
सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं
स त्वं साक्षाद् विष्णुरध्यात्मदीप: ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
श्रीदेवकी ने कहा: हे प्रभु, वेद तो अनेक हैं। उनमें कुछ वेद आपको शब्दों और मन के द्वारा अव्यक्त बताते हैं, पर फिर भी आप समस्त विश्व के कारण हैं। आप ब्रह्म हैं, सब चीज़ों से बड़े हैं और सूर्य के समान तेज से युक्त हैं। आपका कोई भौतिक कारण नहीं है, आप परिवर्तन और विचलन से मुक्त हैं और कोई भौतिक इच्छा भी नहीं है। इस तरह वेदों का कथन है कि आप ही सार हैं। इसलिए हे प्रभु, आप सीधे सभी वैदिक कथनों के स्रोत हैं और आपको समझने पर व्यक्ति धीरे-धीरे सब कुछ समझ जाता है। आप ब्रह्मज्योति और परमात्मा से भिन्न हैं, फिर भी उनसे भिन्न नहीं हैं। आपसे ही सब कुछ निकला है। वास्तव में आप ही सभी कारणों के कारण हैं, आप सभी दिव्य ज्ञान के प्रकाश भगवान विष्णु हैं।
 
Sri Devaki said: O Lord, there are many Vedas. Some of them describe You as unmanifested by words and mind, yet You are the origin of the entire universe. You are Brahman, greater than all things and endowed with brilliance like the sun. You have no material cause, You are free from change and deviation, and You have no material desires. Thus the Vedas state that You are the essence. Therefore, O Lord, You are the origin of all Vedic statements and by understanding You, man gradually understands everything. You are different from the Brahman-light and the Supersoul, yet You are not different from them. All things have emanated from You. Indeed You are the cause of all causes; You are Lord Vishnu, the light of all divine knowledge.
तात्पर्य
विष्णु ही सब कुछ के आधार हैं, और भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण में कोई अंतर नहीं है क्योंकि ये दोनों ही विष्णु-तत्व हैं। ऋग्वेद में हम समझते हैं, ॐ तद विष्णोः परमं पदम्: मूल तत्व सर्वव्यापी भगवान विष्णु हैं, जो परमात्मा और तेजस्वी ब्रह्म भी हैं। जीवित संस्थाएं भी विष्णु का अभिन्न अंग हैं, जिनमें विभिन्न शक्तियां हैं (परास्य शक्तिर विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञान-बल-क्रिया च)। इसलिए, विष्णु या कृष्ण ही सब कुछ हैं। भगवान कृष्ण भगवद-गीता (10.8) में कहते हैं, अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते: "मैं सभी आध्यात्मिक और भौतिक दुनिया का स्रोत हूं। सब कुछ मुझसे निकलता है।" इसलिए कृष्ण ही सब कुछ का मूल कारण हैं (सर्व-कारण-कारणम्)। जब विष्णु अपने सर्वव्यापी पहलू में विस्तार करते हैं, तो हमें उन्हें निराकार-निर्विशेष-ब्रह्मज्योति समझना चाहिए।

हालांकि सब कुछ कृष्ण से निकलता है, लेकिन वह अंततः एक व्यक्ति हैं। अहं आदिर् हि देवानाम्: वह ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के मूल हैं, और उनसे कई अन्य देवता प्रकट होते हैं। इसलिए कृष्ण भगवद-गीता (14.27) में कहते हैं, ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम; "ब्रह्म मुझ पर ही अवस्थित है।" भगवान यह भी कहते हैं:

येऽप्य अन्य-देवता-भक्ता

यजन्ते श्रद्धयान्विताः

तेऽपि मामेव कौन्तेय

यजन्त्यविधि-पूर्वकम्

"हे कुन्ती के पुत्र, एक आदमी अन्य देवताओं को जो कुछ भी बलिदान कर सकता है, वह वास्तव में केवल मेरे लिए है, लेकिन यह सही समझ के बिना चढ़ाया जाता है।" (भगवद्गीता 9.23) ऐसे कई व्यक्ति हैं जो अलग-अलग देवताओं की पूजा करते हैं, उन सभी को अलग-अलग देवता मानते हैं, जबकि वास्तव में वे नहीं हैं। तथ्य यह है कि प्रत्येक देवता और प्रत्येक जीवित व्यक्ति कृष्ण का अभिन्न अंग है (ममैवांशो जीव-लोके जीव-भूत:)। देवता भी जीवित संस्थाओं की श्रेणी में आते हैं; वे अलग देवता नहीं हैं। लेकिन जिन लोगों का ज्ञान अपरिपक्व है और भौतिक प्रकृति के तरीकों से दूषित है, वे अपनी बुद्धि के अनुसार विभिन्न देवताओं की पूजा करते हैं। इसलिए उन्हें भगवद-गीता (कामैस्तैस्तैर् हृता-ज्ञानः प्रपद्यन्तेऽन्य-देवताः) में फटकारा जाता है। क्योंकि वे मूर्ख हैं और बहुत उन्नत नहीं हैं और उन्होंने सच्चाई पर ठीक से विचार नहीं किया है, वे विभिन्न देवताओं की पूजा करते हैं या विभिन्न दर्शनों के अनुसार अनुमान लगाते हैं, जैसे मायावादी दर्शन।

कृष्ण, विष्णु, ही वास्तव में हर चीज की उत्पत्ति हैं। जैसा कि वेदों में कहा गया है, यस्य भाषासर्वमिदं विभाति। परम सत्य को बाद में श्रीमद्-भागवतम (10.28.15) में सत्यं ज्ञानमनंतं यद् ब्रह्म-ज्योतिः सनातनम् के रूप में वर्णित किया गया है। ब्रह्मज्योति सनातन है, शाश्वत है, फिर भी यह कृष्ण पर निर्भर है (ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम)। ब्रह्म-संहिता बताती है कि भगवान सर्वव्यापी हैं। अंडान्तर-स्थ-परमाणु-चयान्तर-स्थम्: वह इस ब्रह्मांड के भीतर हैं, और वह परमात्मा के रूप में परमाणु के भीतर हैं। यस्य प्रभा प्रभवतो जगदंडकोति-कोटिस्वशेष-वसुधादि-विभुति-भिन्नम्: ब्रह्म भी उससे स्वतंत्र नहीं है। इसलिए एक दार्शनिक जो कुछ भी वर्णन कर सकता है वह अंततः कृष्ण है, या भगवान विष्णु (सर्वं खल्विदं ब्रह्म, परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान)। समझ के विभिन्न चरणों के अनुसार, भगवान विष्णु को अलग-अलग वर्णित किया गया है, लेकिन वास्तव में वह सब कुछ का मूल हैं।

क्योंकि देवकी एक निस्वार्थ भक्त थी, वह समझ सकती थी कि उसी भगवान विष्णु ने उसके पुत्र के रूप में प्रकट हुए थे। इसलिए, वसुदेव की प्रार्थनाओं के बाद, देवकी ने अपनी प्रार्थनाएँ कीं। वह अपने भाई के अत्याचारों के कारण बहुत भयभीत थी। देवकी ने कहा, "मेरे प्यारे भगवान, आपके शाश्वत रूप, जैसे नारायण, भगवान राम, शेष, वराह, नृसिंह, वामन, बलदेव और विष्णु से निकलने वाले लाखों समान अवतारों को वैदिक साहित्य में मूल के रूप में वर्णित किया गया है। आप मूल हैं क्योंकि आपके सभी रूप अवतारों के रूप में इस भौतिक सृष्टि से बाहर हैं। इस ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति के निर्माण से पहले आपका रूप मौजूद था। आपके रूप शाश्वत और सर्वव्यापी हैं। वे स्वयं-प्रकाशित, अपरिवर्तनीय और भौतिक गुणों से अप्रभावित हैं। ऐसे शाश्वत रूप हमेशा-सचेत और आनंद से भरे होते हैं; वे दिव्य अच्छाई में स्थित हैं और हमेशा अलग-अलग मनोरंजन में लगे रहते हैं। आप केवल एक विशेष रूप तक सीमित नहीं हैं; ऐसे सभी दिव्य, शाश्वत रूप आत्मनिर्भर हैं। मैं समझ सकती हूँ कि आप सर्वोच्च भगवान विष्णु हैं।" इसलिए, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि भगवान विष्णु ही सब कुछ हैं, हालाँकि वह हर चीज से अलग भी हैं। यह अचिन्त्य-भेदाभेद-तत्त्व दर्शन है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)