हालांकि सब कुछ कृष्ण से निकलता है, लेकिन वह अंततः एक व्यक्ति हैं। अहं आदिर् हि देवानाम्: वह ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के मूल हैं, और उनसे कई अन्य देवता प्रकट होते हैं। इसलिए कृष्ण भगवद-गीता (14.27) में कहते हैं, ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम; "ब्रह्म मुझ पर ही अवस्थित है।" भगवान यह भी कहते हैं:
येऽप्य अन्य-देवता-भक्ता
यजन्ते श्रद्धयान्विताः
तेऽपि मामेव कौन्तेय
यजन्त्यविधि-पूर्वकम्
"हे कुन्ती के पुत्र, एक आदमी अन्य देवताओं को जो कुछ भी बलिदान कर सकता है, वह वास्तव में केवल मेरे लिए है, लेकिन यह सही समझ के बिना चढ़ाया जाता है।" (भगवद्गीता 9.23) ऐसे कई व्यक्ति हैं जो अलग-अलग देवताओं की पूजा करते हैं, उन सभी को अलग-अलग देवता मानते हैं, जबकि वास्तव में वे नहीं हैं। तथ्य यह है कि प्रत्येक देवता और प्रत्येक जीवित व्यक्ति कृष्ण का अभिन्न अंग है (ममैवांशो जीव-लोके जीव-भूत:)। देवता भी जीवित संस्थाओं की श्रेणी में आते हैं; वे अलग देवता नहीं हैं। लेकिन जिन लोगों का ज्ञान अपरिपक्व है और भौतिक प्रकृति के तरीकों से दूषित है, वे अपनी बुद्धि के अनुसार विभिन्न देवताओं की पूजा करते हैं। इसलिए उन्हें भगवद-गीता (कामैस्तैस्तैर् हृता-ज्ञानः प्रपद्यन्तेऽन्य-देवताः) में फटकारा जाता है। क्योंकि वे मूर्ख हैं और बहुत उन्नत नहीं हैं और उन्होंने सच्चाई पर ठीक से विचार नहीं किया है, वे विभिन्न देवताओं की पूजा करते हैं या विभिन्न दर्शनों के अनुसार अनुमान लगाते हैं, जैसे मायावादी दर्शन।
कृष्ण, विष्णु, ही वास्तव में हर चीज की उत्पत्ति हैं। जैसा कि वेदों में कहा गया है, यस्य भाषासर्वमिदं विभाति। परम सत्य को बाद में श्रीमद्-भागवतम (10.28.15) में सत्यं ज्ञानमनंतं यद् ब्रह्म-ज्योतिः सनातनम् के रूप में वर्णित किया गया है। ब्रह्मज्योति सनातन है, शाश्वत है, फिर भी यह कृष्ण पर निर्भर है (ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम)। ब्रह्म-संहिता बताती है कि भगवान सर्वव्यापी हैं। अंडान्तर-स्थ-परमाणु-चयान्तर-स्थम्: वह इस ब्रह्मांड के भीतर हैं, और वह परमात्मा के रूप में परमाणु के भीतर हैं। यस्य प्रभा प्रभवतो जगदंडकोति-कोटिस्वशेष-वसुधादि-विभुति-भिन्नम्: ब्रह्म भी उससे स्वतंत्र नहीं है। इसलिए एक दार्शनिक जो कुछ भी वर्णन कर सकता है वह अंततः कृष्ण है, या भगवान विष्णु (सर्वं खल्विदं ब्रह्म, परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान)। समझ के विभिन्न चरणों के अनुसार, भगवान विष्णु को अलग-अलग वर्णित किया गया है, लेकिन वास्तव में वह सब कुछ का मूल हैं।
क्योंकि देवकी एक निस्वार्थ भक्त थी, वह समझ सकती थी कि उसी भगवान विष्णु ने उसके पुत्र के रूप में प्रकट हुए थे। इसलिए, वसुदेव की प्रार्थनाओं के बाद, देवकी ने अपनी प्रार्थनाएँ कीं। वह अपने भाई के अत्याचारों के कारण बहुत भयभीत थी। देवकी ने कहा, "मेरे प्यारे भगवान, आपके शाश्वत रूप, जैसे नारायण, भगवान राम, शेष, वराह, नृसिंह, वामन, बलदेव और विष्णु से निकलने वाले लाखों समान अवतारों को वैदिक साहित्य में मूल के रूप में वर्णित किया गया है। आप मूल हैं क्योंकि आपके सभी रूप अवतारों के रूप में इस भौतिक सृष्टि से बाहर हैं। इस ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति के निर्माण से पहले आपका रूप मौजूद था। आपके रूप शाश्वत और सर्वव्यापी हैं। वे स्वयं-प्रकाशित, अपरिवर्तनीय और भौतिक गुणों से अप्रभावित हैं। ऐसे शाश्वत रूप हमेशा-सचेत और आनंद से भरे होते हैं; वे दिव्य अच्छाई में स्थित हैं और हमेशा अलग-अलग मनोरंजन में लगे रहते हैं। आप केवल एक विशेष रूप तक सीमित नहीं हैं; ऐसे सभी दिव्य, शाश्वत रूप आत्मनिर्भर हैं। मैं समझ सकती हूँ कि आप सर्वोच्च भगवान विष्णु हैं।" इसलिए, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि भगवान विष्णु ही सब कुछ हैं, हालाँकि वह हर चीज से अलग भी हैं। यह अचिन्त्य-भेदाभेद-तत्त्व दर्शन है।
