ऐसे असभ्य लोग कृष्ण चेतना आन्दोलन के पक्ष में नहीं हैं। लोक सेवकों के रूप में, वे बिना किसी हिचकिचाहट के यह घोषित करते हैं कि हरे कृष्ण आंदोलन का जाप एक उपद्रव है, हालाँकि भगवद्गीता स्पष्ट रूप से कहती है, सततं कीर्तयंतो माम यतंतश्च दृढ़व्रताः। इस श्लोक के अनुसार, महात्माओं का कर्तव्य है कि वे हरे कृष्ण मंत्र का जप करें और अपनी क्षमता के अनुसार इसे पूरी दुनिया में फैलाने का प्रयास करें। दुर्भाग्य से, समाज ऐसी असभ्य अवस्था में है कि तथाकथित महात्मा हैं जो गायों और बच्चों को मारने और हरे कृष्ण आंदोलन को रोकने के लिए तैयार हैं। इस तरह की असभ्य गतिविधियों को वास्तव में हरे कृष्ण आंदोलन के बॉम्बे केंद्र, हरे कृष्ण भूमि के विरोध में प्रदर्शित किया गया था। जैसा कि कंस से देवकी और वसुदेव के सुंदर बच्चे को मारने की उम्मीद नहीं की जाती थी, असभ्य समाज, हालांकि कृष्ण चेतना आंदोलन की उन्नति के बारे में नाखुश था, लेकिन उससे इसे रोकने की उम्मीद नहीं की जा सकती। फिर भी हमें कई तरह से कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। हालाँकि कृष्ण को मारा नहीं जा सकता है, वसुदेव, कृष्ण के पिता के रूप में, कांप रहे थे क्योंकि स्नेह में उन्हें लगा कि कंस तुरंत आकर उनके बेटे को मार डालेगा। इसी तरह, यद्यपि कृष्ण चेतना आन्दोलन और कृष्ण अलग नहीं हैं और कोई भी असुर इसकी जाँच नहीं कर सकता है, हमें डर है कि किसी भी क्षण असुर दुनिया के किसी भी हिस्से में इस आंदोलन को रोक सकते हैं।
