स त्वं त्रिलोकस्थितये स्वमायया
बिभर्षि शुक्लं खलु वर्णमात्मन: ।
सर्गाय रक्तं रजसोपबृंहितं
कृष्णं च वणन तमसा जनात्यये ॥ २० ॥
अनुवाद
हे भगवान, आपके रूप की तुलना तीन भौतिक गुणों से नहीं की जा सकती है, फिर भी तीनों लोकों के पालन के लिए आप अच्छाई में विष्णु के सफेद रंग को धारण करते हैं; निर्माण के लिए, जो जुनून की गुणवत्ता से घिरा हुआ है, आप लाल रंग के रूप में प्रकट होते हैं; और अंत में, जब अज्ञानता से घिरे विनाश की आवश्यकता होती है, तो आप काले रंग के रूप में प्रकट होते हैं।
O Lord, Your form is beyond the three material modes, yet to maintain the three worlds You assume the white color of Vishnu in the mode of goodness. At the time of creation You appear red, covered by the mode of passion. And finally at the time of destruction covered by ignorance You appear dark.
तात्पर्य
वसुदेव ने भगवान से प्रार्थना की, "आपको शुक्लम कहा जाता है। शुक्लम, या 'सफेदी,' परम सत्य का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व है क्योंकि यह भौतिक गुणों से अप्रभावित है। भगवान ब्रह्मा को रक्त, या लाल कहा जाता है, क्योंकि ब्रह्मा सृजन के प्रति जुनून के गुणों का प्रतिनिधित्व करता है। अंधकार को भगवान शिव को सौंपा गया है क्योंकि वह ब्रह्मांड का नाश करते हैं। इस ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति के निर्माण, विनाश और रखरखाव का संचालन आपकी शक्तियों द्वारा किया जाता है, फिर भी आप हमेशा उन गुणों से अप्रभावित रहते हैं।" जैसा कि वेदों में पुष्टि की गई है, हरि हि निर्गुणः साक्षात: भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व हमेशा सभी भौतिक गुणों से मुक्त हैं। यह भी कहा जाता है कि जुनून और अज्ञान के गुण भगवान के व्यक्ति में मौजूद नहीं हैं। इस श्लोक में, उल्लिखित तीन रंग - शुक्ल, रक्त और कृष्ण - को शाब्दिक रूप से नहीं समझा जाना चाहिए, हम अपने इंद्रियों के साथ जो अनुभव करते हैं, बल्कि सत्व-गुण, रजो-गुण और तमो-गुण के प्रतिनिधियों के रूप में। आखिरकार, कभी-कभी हम देखते हैं कि एक बतख सफेद है, हालांकि वह तमो-गुण में है, अज्ञान का तरीका। बकांध-न्याय नामक तर्क को दर्शाते हुए, बतख इतनी बेवकूफ है कि वह एक बैल के वृषण के बाद चलती है, यह सोचकर कि यह एक लटकी हुई मछली है जिसे गिरने पर लिया जा सकता है। इस प्रकार बतख हमेशा अंधेरे में रहती है। हालाँकि, व्यासदेव, वैदिक साहित्य के संकलनकर्ता, काले हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह तमो-गुण में हैं; बल्कि, वह सत्व-गुण की सर्वोच्च स्थिति में हैं, जो प्रकृति के भौतिक प्रकारों से परे है। कभी-कभी इन रंगों (शुक्ल-रक्त तथैव पीत) का उपयोग ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों को नामित करने के लिए किया जाता है। भगवान क्षीरोंदकशायी विष्णु को काले रंग के रूप में मनाया जाता है, भगवान शिव सफेद हैं, और भगवान ब्रह्मा लाल हैं, लेकिन वैष्णव-तोषण-टीका में श्रील सनातन गोस्वामी के अनुसार, रंगों का यह प्रदर्शन यहाँ उल्लेख नहीं किया गया है। शुक्ल, रक्त और कृष्ण की वास्तविक समझ इस प्रकार है। प्रभु हमेशा पारलौकिक होते हैं, लेकिन सृजन के लिए वह भगवान ब्रह्मा के रूप में रक्त का रंग ग्रहण करते हैं। फिर से, कभी-कभी प्रभु क्रोधित हो जाते हैं। जैसा कि वह भगवद्-गीता (16.19) में कहते हैं: तान अहं द्विषतः क्रूराँ सँसारेषु नराधमान क्षिपाम्य अजस्रम अशुभान आसुरीषु एव योनिषु "जो लोग ईर्ष्यालु और शरारती हैं, जो मनुष्यों के बीच सबसे निचले हैं, मुझे उनको भौतिक अस्तित्व के सागर में, विभिन्न राक्षसी जीवन प्रजातियों में डाल दिया जाएगा।" राक्षसों को नष्ट करने के लिए, प्रभु क्रोधित हो जाते हैं, और इसलिए वह भगवान शिव का रूप धारण करते हैं। सारांश में, भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व हमेशा भौतिक गुणों से परे हैं, और हमें केवल इसलिए नहीं सोचना चाहिए क्योंकि हम संवेदना धारणा के कारण भ्रम में हैं। किसी को अधिकारियों, या महाजन के माध्यम से भगवान की स्थिति को समझना चाहिए। जैसा कि श्रीमद-भागवतम (1.3.28) में कहा गया है, एते चांश-कलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान स्वयं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥