य आत्मनो दृश्यगुणेषु सन्निति
व्यवस्यते स्वव्यतिरेकतोऽबुध: ।
विनानुवादं न च तन्मनीषितं
सम्यग् यतस्त्यक्तमुपाददत् पुमान् ॥ १८ ॥
अनुवाद
जो व्यक्ति प्रकृति के तीनों गुणों से बने अपने दृश्य शरीर को आत्मा के निरपेक्ष रूप से अस्तित्ववान मानता है, वह अस्तित्व के मूलभूत सिद्धांत से अपरिचित होता है और इसलिए वह अज्ञानी है। सद्बुद्धि और समझ से संपन्न व्यक्ति इस विचारधारा का समर्थन नहीं करते, क्योंकि वे समझते हैं कि आत्मा की सत्ता के बिना, दृश्य शरीर और उससे जुड़ी इंद्रियाँ, दोनों ही मूल रूप से अस्थायी और भ्रामक हैं। यद्यपि यह स्थापित सिद्धांत है, मूर्ख मनुष्य इसे नकारता है और दृश्य शरीर को ही यथार्थ मानता है।
He who considers his visible body, composed of the three modes of nature, to be independent of the soul, is ignorant of the very basis of existence and is therefore a fool. Those who are learned do not accept this conclusion, for by reasoning it can be understood that the visible body and the senses, without the soul, are immaterial. Although this conclusion has been rejected, the foolish person believes it to be true.
तात्पर्य
आत्मा के मूलभूत सिद्धांत के बिना शरीर का निर्माण नहीं हो सकता। तथाकथित वैज्ञानिकों ने अपनी रासायनिक प्रयोगशालाओं में जीवित शरीर बनाने के लिए कई प्रकार से प्रयास किये हैं, लेकिन कोई भी ऐसा करने में सक्षम न हो सका है क्योंकि जब तक आत्मा आत्मा मौजूद न हो, भौतिक तत्वों से शरीर तैयार नहीं किया जा सकता। चूँकि वैज्ञानिक अब शरीर की रासायनिक संरचना के बारे में सिद्धांतों के प्रति मोहित हो गए हैं, हमने कई वैज्ञानिकों को एक छोटा सा अंडा बनाने की चुनौती दी है। अंडों में पाए जाने वाले रसायनों को बहुत आसानी से पाया जा सकता है। एक सफेद पदार्थ और एक पीला पदार्थ होता है, जो एक खोल से ढका होता है, और आधुनिक वैज्ञानिकों को यह सब आसानी से दोहराने में सक्षम होना चाहिए। लेकिन अगर वे ऐसा अंडा तैयार करते हैं और उसे एक ऊष्मायन यंत्र में रखते हैं, तो यह मानव निर्मित रासायनिक अंडा एक मुर्गी का उत्पादन नहीं करेगा। आत्मा को जोड़ा जाना चाहिए क्योंकि जीवन के लिए एक रासायनिक संयोजन का कोई सवाल ही नहीं है। इसलिए जो लोग सोचते हैं कि आत्मा के बिना जीवन मौजूद हो सकता है, उन्हें यहाँ अबुद्धः, मूर्ख बदमाश के रूप में वर्णित किया गया है। फिर, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो शरीर को असार मानकर उसे अस्वीकार कर देते हैं। वे उसी श्रेणी के मूर्ख हैं। कोई शरीर को न तो अस्वीकार कर सकता है और न ही उसे सार के रूप में स्वीकार कर सकता है। पदार्थ भगवान हैं, और शरीर और आत्मा दोनों ही भगवान की ऊर्जाएँ हैं, जैसा कि स्वयं भगवान ने भगवद-गीता (7.4-5) में वर्णित किया है: भूमीरपोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरिवा च अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे परां जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् "पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार - ये आठों मिलकर मेरी पृथक भौतिक ऊर्जाओं का निर्माण करती हैं। लेकिन इस निम्न प्रकृति के अलावा, हे महाबाहु अर्जुन, मेरी एक श्रेष्ठ ऊर्जा है, जिसमें वे सभी जीवित संस्थाएँ शामिल हैं जो भौतिक प्रकृति से संघर्ष कर रही हैं और ब्रह्मांड को धारण कर रही हैं।" इसलिए, शरीर का भगवान के साथ वैसा ही संबंध है जैसा कि आत्मा का है। चूँकि वे दोनों भगवान की ऊर्जाएँ हैं, इसलिए उनमें से कोई भी झूठा नहीं है, क्योंकि वे वास्तविकता से आते हैं। जो इस जीवन के रहस्य को नहीं जानता उसे अबुद्धः के रूप में वर्णित किया गया है। वैदिक निर्देशों के अनुसार, एतदत्म्यमिदं सर्वं, सर्वं खल्विदं ब्रह्म: सब कुछ परम ब्रह्म है। इसलिए, शरीर और आत्मा दोनों ही ब्रह्म हैं, क्योंकि पदार्थ और आत्मा ब्रह्म से निकलते हैं। वेदों के निष्कर्षों को न जानते हुए, कुछ लोग भौतिक प्रकृति को पदार्थ के रूप में स्वीकार करते हैं, और अन्य आत्मा को पदार्थ के रूप में स्वीकार करते हैं, लेकिन वास्तव में ब्रह्म ही पदार्थ है। ब्रह्म सभी कारणों का कारण है। इस प्रकट भौतिक दुनिया के घटक और तात्कालिक कारण ब्रह्म हैं, और हम इस दुनिया के घटकों को ब्रह्म से स्वतंत्र नहीं बना सकते। इसके अलावा, चूँकि इस भौतिक अभिव्यक्ति के घटक और तात्कालिक कारण ब्रह्म हैं, इसलिए वे दोनों सत्य हैं, सत्य; ब्रह्म सत्यं जगन मिथ्या अभिव्यक्ति की कोई वैधता नहीं है। दुनिया झूठी नहीं है। ज्ञानी इस दुनिया को अस्वीकार करते हैं, और मूर्ख व्यक्ति इस दुनिया को वास्तविकता के रूप में स्वीकार करते हैं, और इस तरह वे दोनों गुमराह होते हैं। हालाँकि शरीर आत्मा जितना महत्वपूर्ण नहीं है, हम यह नहीं कह सकते कि यह झूठ है। फिर भी शरीर अस्थायी है, और केवल मूर्ख, भौतिकवादी व्यक्ति, जिन्हें आत्मा का पूरा ज्ञान नहीं है, अस्थायी शरीर को वास्तविकता मानते हैं और इस शरीर को सजाने में लगे रहते हैं। इन दोनों नुकसानों - झूठे के रूप में शरीर की अस्वीकृति और शरीर को सर्वस्व के रूप में स्वीकार करना - से बचा जा सकता है जब कोई पूरी तरह से कृष्ण चेतना में स्थित होता है। यदि हम इस दुनिया को झूठी मानते हैं, तो हम असुरों की श्रेणी में आते हैं, जो कहते हैं कि यह दुनिया असत्य है, जिसका कोई आधार नहीं है और कोई ईश्वर नियंत्रण में नहीं है (असत्यं अप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम)। जैसा कि भगवद-गीता के सोलहवें अध्याय में वर्णित है, यह राक्षसों का निष्कर्ष है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥