मया ततं इदं सर्वं
जगद व्यक्त मूर्तिना
मत् स्थानी सर्व भूतानि
ना चाहं तेषु अवस्थितः
''मेरे द्वारा, मेरे अव्यक्त रूप में, यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड व्याप्त है। सभी प्राणी मुझ में है, पर मैं उनमें नहीं हूँ।'
भगवान को स्थूल भौतिक इन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता। ऐसा कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण का नाम, यश, लीला आदि को भौतिक इन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता। केवल वही व्यक्ति, जो उचित मार्गदर्शन में शुद्ध भक्ति सेवा में लीन रहता है, उसे ही भगवान का बोध होता है। जैसा कि ब्रह्म-संहिता में उल्लेख किया गया है (5.38) :
प्रेम्ञ्जन-चुरिता-भक्ति-विलोचनेन
संताः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति
जो भगवान के प्रति हृदय में भक्ति भाव रखता है, उसे ही केवल भगवान को सर्वव्यापी रूप में भीतर और बाहर हमेशा देखने का सौभाग्य प्राप्त होता है। पर सामान्य लोगों को भगवान के दर्शन नहीं होते। इसीलिए भगवद् गीता के ऊपर उद्धृत श्लोक में यह कहा गया है कि भले ही भगवान हर जगह व्याप्त हैं, पर भौतिक इन्द्रियों से उन्हें नहीं जाना जा सकता। पर ऐसा नहीं है कि भगवान हमें दिखाई नहीं देते, वास्तव में तो सब कुछ भगवान में ही अवस्थित है। जैसा कि भगवद् गीता के सातवें अध्याय में बताया गया है, यह सम्पूर्ण भौतिक ब्रह्माण्ड केवल भगवान की दो भिन्न ऊर्जाओं के संयोग से बना है। यह आध्यात्मिक ऊर्जा और निम्नतर अर्थात भौतिक ऊर्जा। जैसे कि चारों और सूर्य का प्रकाश व्याप्त रहता है, वैसे ही भगवान की ऊर्जा भी संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है और हर चीज़ उस ऊर्जा में अवस्थित है।
इसके बाद भी किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान सभी जगह व्याप्त हुए है, तो अपना व्यक्तित्व खो दिया होगा। इस तर्क का खंडन करते हुए भगवान ने कहा, "मैं सर्वव्यापी हूं और सब कुछ मुझ में है, पर मैं फिर भी अलग हूं।" उदाहरण के लिए, एक राजा एक सरकार का नेतृत्व करता है जो दरअसल राजा की ऊर्जा का ही प्रकटीकरण है। सरकार के विभिन्न विभाग राजा की ऊर्जा के ही रूप हैं और प्रत्येक विभाग राजा की शक्ति पर ही टिका हुआ है। पर फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि राजा हर विभाग में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहना चाहिए। यह एक सरल उदाहरण है। इसी प्रकार, इस भौतिक और आध्यात्मिक संसार में जितनी भी चीजे हमारे द्वारा देखी जाती हैं और जितनी भी चीजों का अस्तित्व है, वे सभी भगवान की ऊर्जा पर ही टिके हुए हैं। संसार की रचना भगवान की विभिन्न ऊर्जाओं के विस्तार से हुई है और जैसा कि भगवान ने भगवद् गीता में बताया है, वह स्वयं भी अपने निजी रूप से हर जगह उपस्थित हैं, जोकि उनकी विभिन्न ऊर्जाओं के विस्तार द्वारा संभव है।
इस बात पर विवाद हो सकता है कि भगवान, जिन्होंने केवल अपनी दृष्टि से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की है, वह देवकी के गर्भ में कैसे आ सकते हैं? इस विवाद को मिटाते हुए वसुदेव ने कहा, ''हे भगवन, यह कोई बड़ी बात नहीं है कि आप देवकी के गर्भ में प्रकट हुए, क्योंकि इसी प्रकार से सृष्टि की रचना भी हुई थी। आप महा-विष्णु के रूप में कारण सागर में विश्राम कर रहे थे और आपकी साँसों से अनगिनत ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आये। इसके बाद आपने गर्भोदक शायी विष्णु के रूप में प्रत्येक ब्रह्माण्ड में प्रवेश किया। फिर आपने क्षीरोंदक शायी विष्णु के रूप में विस्तार किया और सभी जीवों के हृदय और यहाँ तक कि परमाणुओं में भी प्रवेश किया। इसीलिए आपका देवकी के गर्भ में प्रवेश भी उसी तरह का है। ऐसा प्रतीत होता है कि आपने प्रवेश किया है, पर आप एक साथ सभी जगह व्याप्त भी हैं। हम भौतिक उदाहरणों से आपके प्रवेश और अप्रवेश को समझ सकते हैं। सम्पूर्ण भौतिक ऊर्जा 16 तत्वों में विभाजित होने के बावजूद भी एक बनी रहती है। भौतिक शरीर पाँच स्थूल तत्वों - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश का संयोजन है। जब भी एक शरीर बनता है, ऐसा प्रतीत होता है कि यह तत्व नव निर्मित हैं, पर वास्तव में ये तत्व शरीर के बाहर भी हमेशा मौजूद रहते हैं। इसी प्रकार, आप देवकी के गर्भ में एक शिशु के रूप में प्रकट हुए हैं, पर आप बाहर भी है। आप हमेशा अपने निवास में होते हैं, फिर भी आप एक साथ लाखों रूपों में विस्तारित भी हो सकते हैं।
"आपके प्रकट होने को महान बुद्धि से समझना होगा क्योंकि भौतिक ऊर्जा भी आपसे निकली हुई है। आप भौतिक ऊर्जा के मूल स्रोत हैं, जैसे सूर्य धूप का स्रोत है। धूप सूर्य को नहीं ढक सकती है, न ही भौतिक ऊर्जा - आपके द्वारा उत्सर्जित होने के कारण - आपको ढँक सकती है। आप भौतिक ऊर्जा के तीन गुणों में प्रकट होते प्रतीत होते हैं, लेकिन वास्तव में भौतिक ऊर्जा के तीन गुण आपको ढक नहीं सकते। यह अत्यधिक बुद्धिमान दार्शनिकों द्वारा समझा जाता है। दूसरे शब्दों में, यद्यपि आप भौतिक ऊर्जा के भीतर प्रकट होते प्रतीत होते हैं, आप इसके द्वारा कभी भी ढके नहीं जाते हैं।"
हम वैदिक संस्करण से सुनते हैं कि परम ब्रह्म अपनी चमक प्रदर्शित करता है और इसलिए सब कुछ प्रकाशित होता है। हम ब्रह्मा-संहिता से समझ सकते हैं कि ब्रह्मज्योति, या ब्राह्मण तेज, परम भगवान के शरीर से निकलता है। और ब्रह्म तेज से, सभी सृजन होते हैं। भगवद-गीता में यह भी कहा गया है कि भगवान ब्रह्म तेज के आधार हैं। मूल रूप से वह हर चीज़ के मूल कारण हैं। लेकिन जो लोग कम बुद्धिमान हैं, वे सोचते हैं कि जब भगवान इस भौतिक दुनिया में आते हैं, तो वे भौतिक गुणों को स्वीकार करते हैं। इस तरह के निष्कर्ष परिपक्व नहीं होते हैं, लेकिन कम बुद्धिमान द्वारा बनाए जाते हैं।
