श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 3: कृष्ण जन्म  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  10.3.13 
श्रीवसुदेव उवाच
विदितोऽसि भवान् साक्षात्पुरुष: प्रकृते: पर: ।
केवलानुभवानन्दस्वरूप: सर्वबुद्धिद‍ृक् ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
वसुदेव ने कहा: हे भगवान, आप इस भौतिक जगत से परे परम पुरुष हैं और आप परमात्मा हैं। आपके स्वरूप का अनुभव उस दिव्य ज्ञान द्वारा हो सकता है, जिससे आप भगवान के रूप में समझे जा सकते हैं। अब आपकी स्थिति मेरी समझ में भलीभाँति आ गई है।
 
Vasudeva said: O Lord, You are the Supreme Person beyond this material world and You are the Supersoul. Your true nature can be realized through that transcendental knowledge by which You can be understood as the Supreme Personality of Godhead. Now I have understood Your position very well.
तात्पर्य
वसुदेव के हृदय में, अपने पुत्र के प्रति स्नेह और सर्वोच्च स्वामी के दिव्य स्वरूप का ज्ञान दोनों ही जागृत हो गए। शुरू में वसुदेव ने सोचा, "इतना सुंदर बच्चा पैदा हुआ है, लेकिन अब कंस आकर उसे मार देगा।" लेकिन जब उन्हें समझ आया कि यह कोई साधारण बच्चा नहीं है बल्कि भगवान हैं, तब उन्हें कोई डर नहीं रहा। अपने पुत्र को सर्वोच्च स्वामी के रूप में मानते हुए, जो हर तरह से अद्भुत हैं, उन्होंने सर्वोच्च स्वामी के लिए उपयुक्त प्रार्थनाएँ अर्पित करना शुरू कर दिया। कंस के अत्याचारों के भय से पूरी तरह मुक्त होकर, उन्होंने बच्चे को एक साथ स्नेह की वस्तु और प्रार्थनाओं द्वारा पूजा की वस्तु के रूप में स्वीकार किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)