"इस संदर्भ में, हम श्रील रूप गोस्वामी के उज्ज्वल-नीलमणि में वर्णित विधि के अनुसार अपना विश्लेषण करेंगे। गोपिकाओं की दो श्रेणियाँ हैं: नित्य-सिद्ध (नित्य-सिद्ध) और भक्ति-योग (साधन-सिद्ध) का अभ्यास करके पूर्ण हुई हैं। साधन-सिद्ध दो श्रेणियों की होती हैं: वे जो विशेष समूहों से संबंधित हैं और जो नहीं हैं। और विशेष समूहों से संबंधित गोपियों के भी दो वर्ग होते हैं: अर्थात् श्रुति-चारी, जो व्यक्तित्व वेदों के समूह से आती हैं, और ऋषि-चारी, जो ऋषियों के समूह से आती हैं जिन्होंने दंडकारण्य के जंगल में भगवान रामचंद्र को देखा था।
"गोपियों का यही चार गुना वर्गीकरण पद्म पुराण में दिया गया है:
गोप्यास्तु श्रुतयो ज्ञेया
ऋषि-जा गोप-कन्यकाः
देव-कन्याश्च राजेंद्र
ना मानुष्याः कथंचन
'यह समझा जाता है कि कुछ गोपियाँ वैदिक साहित्य के व्यक्तित्व हैं, जबकि अन्य पुनर्जन्म ऋषि, गौ चरवाहे की बेटियाँ या देव कन्याएँ हैं। लेकिन किसी भी तरह नहीं, मेरे प्रिय राजा, उनमें से कोई भी साधारण मनुष्य नहीं हैं।' यहां हमें सूचित किया जाता है कि हालांकि गोपियाँ मानव गाय चरवाहे लड़कियों के रूप में प्रकट हुईं, वे वास्तव में नहीं थीं। इस प्रकार यह तर्क खंडित हो जाता है कि वे नश्वर हैं।
"गो चरवाहों की बेटियाँ, जिन्हें यहाँ गोप-कन्याओं के रूप में संदर्भित किया गया है, उन्हें नित्य-सिद्ध होना चाहिए, क्योंकि हमने कभी नहीं सुना कि उन्होंने कोई साधना की हो। गोपियों की भूमिका में देवी कात्यायनी की पूजा करने की उनकी स्पष्ट साधना केवल मनुष्यों के रूप में खेलने के उनके तरीके को प्रकट करती है, और भागवतम इस पूजा का वृत्तांत केवल यह दिखाने के लिए वर्णन करता है कि उन्होंने गौ चरवाहों की भूमिका को पूरी तरह से कैसे अपनाया था।
"कि गोप-कन्या गोपियाँ वास्तव में नित्य-सिद्ध हैं, भगवान के नित्य-पूर्ण भक्त, ब्रह्म-संहिता (5.37) में एक कथन द्वारा स्थापित किया गया है - आनंद-चिन्मय-रस-प्रतिभावितभिः - जो साबित करता है कि वे भगवान की आध्यात्मिक आनंद शक्ति हैं। इसी तरह, हमारे पास गौतमीय-तंत्र के शब्द हैं, ह्लदिनी या महा-शक्तिः। उनकी शाश्वत पूर्णता का और अधिक प्रमाण यह है कि ये गोपियाँ, भगवान कृष्ण, उनके प्रेमी के साथ सह-अनुकूल हैं, अठारह अक्षर वाले मंत्र, दस अक्षर वाले मंत्र और अन्य में उनके साथ उल्लेख किया गया है, और इन मंत्रों की पूजा भी की गई है, और उन्हें प्रस्तुत करने वाली श्रुतियाँ भी अनादिकाल से ही अस्तित्व में हैं।"
देव-कन्याओं, जो समुद्र देवता की बेटियाँ हैं, जिनका उल्लेख भगवान से शुरू होने वाले श्लोक में किया गया है, श्री उज्ज्वल-नीलमणि में गोपियों के आंशिक विस्तार के रूप में समझाया गया है जो नित्य-सिद्ध हैं। श्रुति-चारी गोपियाँ, व्यक्तित्व वेद, साधन-सिद्ध हैं, इसे उनके निम्नलिखित शब्दों से समझा जाता है जो बृहद-वामन पुराण में उद्धृत किए गए हैं:
कंदरपा-कोटि-लावण्ये
त्वायी दृष्टे मनस नः
कामिनी-भावम आसाद्य
स्मरा-क्षुब्ध-न्या-संशयः
यथा त्वल-लोका-वासिन्यः
कामा-तत्त्वेना गोपिकाः
भजन्ति रमणम मतवा
चिकीर्षानजनिना तया
'जब से हमनें आपका चेहरा देखा है, जिसमें लाखों कामदेव की खूबसूरती है, हमारे मन युवा लड़कियों की तरह आपके प्रति कामुक हो गए हैं, और हम बाकी सभी आकर्षण भूल गए हैं। हमने आपकी ओर वैसी ही चाहत पैदा कर ली है जैसी गोपिकाएँ करते हैं जो आपके अलौकिक ग्रह पर रहती हैं और आपको अपने परमेश्वर मानकर पूजा करती हैं, उस प्रकृति के कामदेव को प्रकट करती हैं।'
" ऋषि-चारी गोपियाँ भी साधना-सिद्ध हैं, जैसा कि उज्ज्वल-नीलमणि में कहा गया है: गोपालोपासकाः पूर्वमप्राप्तभीष्ट-सिद्धयः। पहले वे सभी दंडक वन में रहने वाले महर्षि थे। इसका प्रमाण हमें पद्म पुराण, उत्तर-खंड में मिलता है: दृष्ट्वा रामं हरिं तत्र भोक्तुमैच्छन् सु-विग्रहम्, ते सर्वे स्त्रीत्वमापन्नाः समूद्भूताश्च गोकुले। हरिं सम्प्राप्य कामना तो मुक्ता भवारणवात्। इस श्लोक में कहा गया है कि दंडक वन में भगवान रामचंद्र को देखकर ऋषियों ने भगवान हरि (कृष्ण) का आनंद लेना चाहा। दूसरे शब्दों में, भगवान राम की सुंदरता की दृष्टि ने उन्हें भगवान हरि, गोपाल, उनकी पूजा के व्यक्तिगत उद्देश्य की याद दिला दी, और तब वे उनके साथ आनंद लेना चाहते थे। लेकिन शर्मिंदगी के कारण उन्होंने उस इच्छा पर अमल नहीं किया, जिस पर भगवान श्री राम, जो एक इच्छा वृक्ष की तरह हैं, ने उनकी इच्छा पूरी की, भले ही उन्होंने अपना अनुरोध नहीं किया था। इस प्रकार उनकी इच्छा पूरी हुई, जैसा कि ते सर्वे से शुरू होने वाले शब्दों से कहा गया है। अपने कामुक आकर्षण के माध्यम से वे भौतिक अस्तित्व के सागर, जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो गए, और संयोग से उन्हें दांपत्य प्रेम में हरि का साथ मिला।
"भागवतम के वर्तमान श्लोक में हम समझते हैं कि यह गोपियाँ ही थीं जिनके बच्चे थे जिन्हें जबरन घर पर रखा गया था। यह तथ्य आने वाले श्लोकों से स्पष्ट है: मात्र पितर पुत्र (भाग। 10.29.20), यत्-पत्य-अपत्य-सुहृदां अनुवृत्ति अंग (भाग। 10.29.32) और पति-सुतानुवंय-भ्रात-बंधवन (भाग। 10.31.16)। दसवें छंद पर अपनी टिप्पणियों में, श्रीला कवि-कर्णपूर गोस्वामी इस तथ्य का उल्लेख करते हैं। इस श्लोक पर उनके सभी विचारों को दोहराने की कोशिश किए बिना, हम उनके तात्पर्य का सार देंगे:
"'भगवान श्री रामचंद्र के व्यक्तिगत रूप को देखकर, जो भगवान गोपाल के उपासक थे, वे तुरंत सहज भक्ति के परिपक्व मंच पर पहुँच गए, अपने आप ही दृढ़ विश्वास, आकर्षण और लगाव के चरणों तक पहुँच गए। लेकिन उन्होंने अभी तक अपने आप को सभी भौतिक दूषित होने से पूरी तरह मुक्त नहीं किया था; इसलिए श्री योग-माया-देवी ने उनके लिए गोपियों के गर्भ से जन्म लेने और ग्वालिनियाँ बनने की व्यवस्था की। शाश्वत परिपूर्ण गोपियों से जुड़कर, इनमें से कुछ नई गोपियों ने यौवन तक पहुँचते ही कृष्ण के लिए पूर्ण-राग प्रेम आकर्षण को पूरी तरह से प्रकट किया। (इस तरह का आकर्षण प्रिय से मिलने से पहले ही विकसित हो जाता है।) जब इन नई गोपियों को कृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन मिले और वे शारीरिक रूप से उनके साथ जुड़ीं, तो उनके सभी शेष संदूषण जल गए, और उन्होंने प्रेम, स्नेह आदि के उन्नत चरण प्राप्त किए।
"'भले ही वे अपने ग्वाले पतियों की संगति में थीं, योग-माया की शक्ति से गोपियाँ उनके साथ यौन संपर्क से अछूती रहीं; बल्कि, वे विशुद्ध आध्यात्मिक शरीरों में स्थित थीं जिनका कृष्ण आनंद उठाते थे। जिस रात उन्होंने कृष्ण की बांसुरी की ध्वनि सुनी, उनके पतियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन योग-माया की दयालु सहायता से साधना-सिद्ध गोपियाँ नित्य-सिद्ध गोपियों के साथ अपनी प्रेमिका के पास जाने में सक्षम हुईं।"
‘‘अन्य गोपियों ने, नित्य सिद्ध गोपियों और अन्य उन्नत गोपियों के संग की शुभ किस्मत न मिलने के कारण, प्रेम की अवस्था प्राप्त नहीं की थी और इसलिये उनका दाग पूरी तरह से मिट नहीं पाया था। वे अपने गोप चरवाह पतियों के संग में चली गईं और उनके साथ यौन संबंध बनाकर संतान को जन्म दिया। किंतु कुछ समय पश्च्यात वो गोपियां भी कृष्ण के शारीरिक संग की प्रबल तड़प से अपने पूर्व-राग को विकसित करने लगीं - वो तड़प उन्हें उन्नत गोपियों के साथ मेल-जोल से प्राप्त हुई थी। पूर्ण गोपियों की दया का पात्र बनती हुईं, उन्होंने कृष्ण द्वारा आनंद लिए जाने के योग्य दिव्य शरीर ग्रहण किए, और जब योग-माया उनके पतियों द्वारा उन्हें बाहर जाने से रोकने के प्रयासों पर काबू पाने में उनकी मदद करने में असफल हो गई, तो उन्होंने अपने आपको सबसे बड़ी विपत्ति में घिरा हुआ महसूस किया। अपने पतियों, भाइयों, पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को शत्रु मानते हुए, वो मृत्यु के करीब आ गईं। जैसे अन्य स्त्रियाँ मृत्यु के समय अपनी माताओं या अन्य संबंधियों को याद करती हैं, इन गोपियों ने अपने जीवन के एकमात्र मित्र, कृष्ण को याद किया, जैसाकि भागवतम के वर्तमान पद में कहा गया है, अंतर शब्द से शुरू होकर।
‘‘इसका तात्पर्य है कि वो स्त्रियां बाहर नहीं निकल पा रहीं थीं क्योंकि उन्हें उनके पतियों ने रोक रखा था, जो उनके सामने डंडे लिए खड़े थे और उन्हें डांट रहे थे। हालाँकि ये गोपियाँ लगातार कृष्ण के प्रेम में लीन रहती थीं, उस विशेष समय पर उन्होंने उनका ध्यान किया और अंदर ही अंदर चिल्लाया: "अफ़सोस, अफ़सोस, ऐ हमारे जीवन के एकमात्र मित्र! ऐ वृन्दावन जंगल के कला कौशल के सागर! कृपया हमें किसी भविष्य के जीवन में अपनी प्रेमिका बनने दो, क्योंकि इस समय हम आपके कमल जैसे चेहरे को अपनी आँखों से नहीं देख पा रही हैं। तो ऐसा ही हो; हम आपको अपने मन से देखेंगी।" इस तरह से अपनी-अपनी अवस्था पर विलाप करते हुए, गोपियाँ अपनी आँखें बंद करके खड़ी रहीं और उनका ध्यान गहराई से उन पर लगा रहा।’’’
