श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 29: रासनृत्य के लिए कृष्ण तथा गोपियों का मिलन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  10.29.48 
तासां तत् सौभगमदं वीक्ष्य मानं च केशव: ।
प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवान्तरधीयत ॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
सौभाग्य से मदोन्मत्त गोपियों को देखकर भगवान केशव ने उन्हें इस अहंकार से मुक्त कराना चाहा और उन पर और अधिक कृपा बरसानी चाही। इसके साथ ही वह तुरंत ही अंतर्ध्यान हो गये।
 
Seeing the gopis extremely proud of their good fortune, Lord Keshav wanted to relieve them of this pride and wanted to shower more favours on them. So he immediately disappeared.
तात्पर्य
प्रसादाय शब्द यहां महत्वपूर्ण है। भगवान कृष्ण गोपियों की उपेक्षा करने नहीं जा रहे थे; बल्कि, वह एक अन्य शानदार व्यवस्था करके उनके प्रेम के प्रभाव को बढ़ाना चाहते थे। क्योंकि अंततः, गोपियाँ कृष्ण पर ही गर्व करती थीं। उन्होंने, जैसा कि हम देखेंगे, यह व्यवस्था इसलिए की कि राजा वृषभानु की सुंदर युवा पुत्री पर विशेष कृपा की जाए।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दस के अंतर्गत उनतीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)