श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 29: रासनृत्य के लिए कृष्ण तथा गोपियों का मिलन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  10.29.44 
उपगीयमान उद्गायन् वनिताशतयूथप: ।
मालां बिभ्रद्वैजयन्तीं व्यचरन्मण्डयन् वनम् ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
जैसे ही गोपियाँ उनकी प्रशंसा गाती हैं, तो सैंकड़ों स्त्रियों के नायक ने तेज आवाज़ में उत्तर गाना शुरू कर दिया। वो अपनी वैजयन्ती माला पहनकर उनके बीच घूम रहे थे और वृन्दावन के जंगल की शोभा बढा रहे थे।
 
When the gopis started singing his praises, the leader of hundreds of women started singing loudly in response. Wearing his Vaijayanti garland, he moved around among them, enhancing the beauty of the forest of Vrindavan.
तात्पर्य
श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार, भगवान कृष्ण ने कई अद्भुत धुनें और मीटर गाए और गोपियाँ उनके नेतृत्व का पालन करते हुए उनके साथ हुईं। इस अवसर पर कृष्ण के गायन का वर्णन श्री विष्णु पुराण में इस प्रकार किया गया है:

कृष्णः शरच-चंद्रमसं

कौमुदीं कुमुदाकरं

जगौ गोपी-जनस्त्व एकं

कृष्ण-नाम पुनः पुनः

"कृष्ण ने शरद ऋतु के चंद्रमा, चांदनी और कमल से भरी नदी की जय गाया, जबकि गोपियों ने केवल बार-बार उनका नाम जपा।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)