श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 29: रासनृत्य के लिए कृष्ण तथा गोपियों का मिलन  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  10.29.38 
तन्न: प्रसीद वृजिनार्दन तेऽङ्‍‍‍‍‍घ्रिमूलं
प्राप्ता विसृज्य वसतीस्त्वदुपासनाशा: ।
त्वत्सुन्दरस्मितनिरीक्षणतीव्रकाम-
तप्तात्मनां पुरुषभूषण देहि दास्यम् ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए, हे सभी दुखों को दूर करने वाले, कृपया हम पर दया करें। आपके चरणों तक पहुंचने के लिए हमने अपने परिवार और घर छोड़ दिए हैं, और हमें आपकी सेवा करने के अलावा कुछ नहीं चाहिए। हमारे दिल आपकी सुंदर मुस्कान वाली झलक से उत्पन्न तीव्र इच्छाओं से जल रहे हैं। हे पुरुषों के रत्न, कृपया हमें अपनी दासी बना लें।
 
Therefore, O remover of all sufferings, have mercy on us. We have left our families and homes to reach your feet and we want nothing more than to serve you. Our hearts are burning with intense desire generated by your beautiful smiling look. O jewel of a man, make us your maids.
तात्पर्य
जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, ऋषि गर्ग ने भविष्यवाणी की कि वे सर्वोच्च भगवान नारायण की सभी समृद्धियों को प्रकट करेंगे। गोपियाँ अब भगवान से दयालु होने और उन्हें प्रत्यक्ष सेवा प्रदान करके इस भविष्यवाणी को पूरा करने की अपील करती हैं, जैसे भगवान नारायण अपने प्यारे भक्तों को प्रत्यक्ष सेवा प्रदान करते हैं। गोपियों ने जोर देकर कहा कि उन्होंने कृष्ण से उच्च सुख प्राप्त करने की आशा में अपने परिवार और घर नहीं छोड़े। वे केवल सेवा के लिए भीख माँग रही हैं, अपनी शुद्ध हृदय की भक्ति प्रकट कर रही हैं। गोपियाँ सोचती हैं, "यदि आपके अपने सुख का अनुसरण करने के दौरान हम किसी तरह आपके चेहरे को देखकर खुश हो जाती हैं, तो इसमें क्या हर्ज है?" श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती टिप्पणी करते हैं, "हे पुरुषों में रत्न" शब्दों पर। ठाकुर कहते हैं कि गोपियों का कहना था, "हे सभी पुरुषों के रत्न, कृपया अपने अंगों के गहरे नीले रंग के रत्नों से हमारे सुनहरे शरीर को सजाएँ।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)