श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 29: रासनृत्य के लिए कृष्ण तथा गोपियों का मिलन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  10.29.34 
चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु
यन्निर्विशत्युत करावपि गृह्यकृत्ये ।
पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद्
याम: कथं व्रजमथो करवाम किं वा ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
आज तक हमारा मन गृहकार्यों में उलझा हुआ था, पर आपने हमारी जानकारी के बिना ही हमारे मन और हाथों को गृहकार्यों से दूर कर दिया है। अब हमारे पैर आपके चरणों से एक पग भी दूर नहीं हटेंगे। इस अवस्था में हम वृंदावन कैसे जा सकते हैं? वृंदावन जाकर हम क्या करेंगे?
 
Till today our minds were absorbed in household chores but you have easily stolen our minds and our hands from our household chores. Now our feet will not move even a step away from your lotus feet. How can we go back to Vraj? What will we do there?
तात्पर्य
श्री कृष्ण अपनी बाँसुरी बजा चुके थे और इसके छिद्रों से निकली मादक संगीत धुनों ने युवतियों की मन चुरा लिया था। वे अब कृष्ण से अपनी चुराई गई संपत्ति लौटाने की माँग करने आई थीं, लेकिन वे अपने दिमाग को पुनः प्राप्त कर सकती थीं यदि श्री कृष्ण उन्हें स्वीकार करते और उनके साथ संयोगी संबंध बनाते।

श्री कृष्ण ने जवाब दिया होगा, "लेकिन मेरी प्यारी गोपियों, अभी के लिए तो घर जाओ। मुझे एक या दो दिन के लिए स्थिति पर विचार करने दो और फिर मैं तुम्हें तुम्हारे दिमाग लौटा दूंगा।" इस संभावित तर्क के जवाब में, गोपियां कहती हैं, "हमारे पैर एक कदम भी चलने से इंकार कर रहे हैं। इसलिए कृपया हमें हमारे दिमाग वापस दे दो और हमें स्वीकार करो, फिर हम जाएंगे।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)