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bhagavat 10.29.33: सुविज्ञ संध्यावादी हमेशा आपसे प्रेम करते हैं क्योंकि वे आपको अपनी सच्ची आत्मा और शाश्वत प्रेमी के रूप में पहचानते हैं। हमारे इन पतियों, बच्चों और रिश्तेदारों से हमें क्या लाभ है, जो हमें केवल परेशान करते हैं? इसलिए, हे परम नियंत्रक, हम पर अपनी दया करें। हे कमल आँखों वाले, कृपया अपने सान्निध्य चाहने की हमारी लंबे समय से पोषित आशा आकांक्षा को नष्ट न करें।   |   bhagavat अध्याय 10.29: रासनृत्य के लिए कृष्ण तथा गोपियों का मिलन   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 29: रासनृत्य के लिए कृष्ण तथा गोपियों का मिलन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  10.29.33 
कुर्वन्ति हि त्वयि रतिं कुशला: स्व आत्मन्
नित्यप्रिये पतिसुतादिभिरार्तिदै: किम् ।
तन्न: प्रसीद परमेश्वर मा स्म छिन्द्या
आशां धृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
सुविज्ञ संध्यावादी हमेशा आपसे प्रेम करते हैं क्योंकि वे आपको अपनी सच्ची आत्मा और शाश्वत प्रेमी के रूप में पहचानते हैं। हमारे इन पतियों, बच्चों और रिश्तेदारों से हमें क्या लाभ है, जो हमें केवल परेशान करते हैं? इसलिए, हे परम नियंत्रक, हम पर अपनी दया करें। हे कमल आँखों वाले, कृपया अपने सान्निध्य चाहने की हमारी लंबे समय से पोषित आशा आकांक्षा को नष्ट न करें।
 
The wise spiritualists always love You because they consider You to be their real Self and eternal lover. What benefit do we derive from our husbands, children and relatives, who are only troublers to us? Therefore, O Supreme Controller, be kind to us. O lotus-eyed One, do not destroy our long-cherished desire and hope to seek Your association.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)